गुरुवार, 3 मार्च 2016

एक बहस पत्रकारिता पर...


अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

शादी समारोह और पत्रकार


छत्तीसगढ़ पिछले हफ्ते वी आई पी शादियों के लिए चर्चा में रहा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा और प्रदेश सरकार के मंत्री द्धय बृजमोहन अग्रवाल ओर अमर अग्रवाल के यहां शादियां थी। इस शादी में बंटे निमंत्रण पत्र ओर इसमें आने वाले मेहमानों की चर्चा रही लेकिन इस समारोह में शामिल होने वाले पत्रकारों की चर्चा भी मीडिया जगत में होने लगी है।
तीनों ही शादियों के निमंत्रण पत्र पत्रकारों के रूतबे के हिसाब से बांटा गया। बैनर को प्राथमिकता तो दी ही गई। विवाह समारोह में शामिल होने गाडिय़ों के भी प्रबंध किये गये। शादी समारोह में शामिल होने वाले फोटोग्राफरों ने तस्वीरें भी खूब ली लेकिन उस तरह से नहीं छपा। सबसे बड़ी शदी का तमगा बृजमोहन अग्रवाल ले गये। अन्य समारोह से ज्यादा वीआईपी और भीड़ भी मोहन भैया ने ही खीची लेकिन पत्रकारों को आने वाले वीआई पी अतिथि से बातचीत करने का मौका नहीं मिला। कुछ पत्रकार इस कोशिश में लगे भी रहे लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। हां वीआईपी लोगों के खुशामत करते स्थानीय नेताओं की तस्वीरें भी कैद करने में फोटो ग्रफर सफल हो गये लेकिन किसी की यह सब छप नहीं पाया।
नवभारत में फिर 
तनाव शुरू...
नवभारत में रंगा-बिल्ला की जोड़ी अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रहे हैं जिसके चलते एक बार फिर कर्मचारियों में आक्रोश पनपने लगा है और वे इस बार आर पार की लड़ाई करने के मूड में है तो क्रानिकल वाले इसका इंतजार कर रहे हैं।
वेतन को लेकर 
माथापच्ची...
पत्र नहीं मित्र बताने वाले एक अखबार में वेतन को लेकर फिर संकट शुरू हो गया है। यहां के कर्मचारी टाईम पर वेतन नहीं मिलने का रोना तो रो रहे हैं लेकिन सामने आकर कुछ करने की हिम्मत नहीं है। फिर मालिकों के दलालों की भी कमी नहीं हैं इसलिए अपनी व्यथा दबी जुबान पर कर रहे हैं।
पिकनिक और मजा 
हर साल की तरह इस बार भी प्रेस क्लब परिवार 26 जनवरी को मनोंरजन भ्रमण पर निकले थे। रतनपुर महामाया के दर्शन से अभिभूत पत्रकार जब कानन पेंडारी पहुंचे तो सोमवार होने की वजह से ताला लगा था। वहीं कुछ देर बिताने के बाद कई नाराज लोग होटल पहुंचे तो रात के खाने की व्यवस्था से कानन पेड़ारी नहीं घूम पाने का दर्द भूल गये। हर बार की तरह इस बार भी पत्रकार परिवारों ने खूब मजा किया।
दबंग की दंबगई 
राजधानी से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ने एक ही बार में कई पत्रकारों को चलता कर दिया। अचानक नौकरी जाने की मुसिबत से पत्रकार दुखी हैं और वे इसकी शिकायत भी कर रहे है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है।
पहल एक नई सोच
 पत्रिका का विमोचन
रायपुर। डी.एड. प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा के दूरस्थ प्रशिक्षण डी.एड.के प्रशिक्षार्थियोँ द्वारा पहल एक नई सोच नामक पत्रिका का विमोचन प्रशिक्षण केन्द्र शा.उच्च. मा. वि. पिथौरा मेँ किया गया। जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार पटनायक, विशिष्ट अतिथि पी.एस. श्याम प्राचार्य डाइट महासमुन्द, एम.डी. प्रधान सेवानिवचत प्राचार्य, एम.के. दास प्राचार्य प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा ने सभा को संबोधित किया। केन्द्र समन्वयक शंकर गोयल ने इसे एक अभिनव पहल बताया वहीं संपादक इंदीवर वैष्णव ने पत्रिका पर प्रकाश डाला। सहसंपादक सुन्दर लाल डडसेना ने पत्रिका को एक नई सोच को संज्ञा के अनुरुप बताया तथा नीरज दास ने आभार प्रकट किया। पत्रिका को प्रकाशित करने मेँ सभी प्रशिक्षार्थियों का प्रत्यक्ष एवं परोख सहयोग रहा।
और अंत में...
प्रेस क्लब का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहा है कई पदाधिकारियों की धड़कने तेज होने लगी है। व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं होने से कई नारा जो हैं। 

सोमवार, 24 मार्च 2014

मीडिया को गरियाने का मतलब...


इन दिनों कार्पोरेट मीडिया घराना आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल और उसकी टीम के निशाने पर है। लोकपाल बिल को लेकर राजनीति में आने वाले अरविन्द केजरीवाल का यह हमला कितना कारगर और सही है यह विवाद का विषय है। विवाद का विषय तो कार्पोरेट मीडिया घराना के कारनामों भी है। कार्पोरेट मीडिया घराना की विश्वसनियता पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। खासकर चुनावों में पेड न्यूज को लेकर इन पर हमला पहले भी होता रहा है। सुखद स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ में यह स्थिति पूरी तरह हावी नहीं है। खबरों को लेकर आम लोगों की नाराजगी जरूर है। बड़े लोगों के खिलाफ खबरे ठीक से प्रकाशित नहीं करने का आरोप भी लगता रहा है लेकिन पत्रकारिता के मल्यों को लेकर सवाल कम ही है। छत्तीसगढ़ में अखबार की आड़ में जमीन लेने और सरकारी सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर सवाल तो उठते हैं लेकिन इससे परे जाकर पत्रकारिता के मूल्यों की चिंता करने वालों की भी कमी नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आज भी प्रिंट मीडिया हावी है और इलेक्ट्रानिक मीडिया भी उस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि कोसा जा सके। नवभारत की विश्वसनियता आज भी कायम है तो भास्कर के मार्केटिंग का कोई जवाब नहीं है पत्रिका का तेवर बरकरार है तो दूसरे अखबार भी खबरों को लेकर चर्चा में बने रहने को जुगत में लगे हैं। यह अलग बात है कि आज भी भंडाफोड़ खबरों के लिए छोटे अखबार ही माहिर है। संपादकीय टीम पर भले ही विज्ञापन या मार्केटिंग वाले हावी हो लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों पर समझौते की स्थिति कम ही है। यह अलग बात है कि अखबारों के द्वारा सरकारी जमीन लेने और अधिमान्यता लेने  में अखबार मालिकों में होड़ मची है लेकिन यहां के ज्यादातार पत्रकारों को अब भी सरकारी सुविधा लेने में परहेज है। अरविन्द केजरीवाल के मीडिया पर लगाये आरोप को लेकर छत्तीसगढ़ में भी हलचल कम नहीं है। और इस पर दोनों तरह की राय स्पष्ट दिखने लगी है। एक वर्ग इसे अखबार को धंधा बनाने वालों पर हमला के रूप में देखता है तो दूसरा वर्ग इससे पत्रकारिता के और मजबूत होने की उम्मीद के रूप में देखता है। ऐसा नहीं है कि मीडिया पर आरोप पहली बार लगा है पहले भी इस तरह के सवाल उठते रहे हैं।
प्रेस क्लब में होली
प्रेस क्लब में होली का कार्यक्रम इस बार अलग ही ढंग का रहा। होलिका दहन के दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया लेकिन दूसरे दिन यानी रंग खेलने सभी पहुंचे। कुछ लोग दस साल बोतल नहीं मिल पाने का टोना रो रहे थे लेकिन यह कसर भी दूर हो गई ज्यादातर वही लोग आये जो रोज आते हैं।
नानसेंस टाईम्स की खाना पूर्ति
हर साल अपना जलवा दिखाने वाला नानलेंस टाईम्स इस बार खाना पूर्ति करता नजर आया। तपेश जैन, मधुसूदन शर्मा की यह शुरूआत इस बार फीका रहा। खबरों से ज्यादा विज्ञापन हावी रहा तो कई लोग जान बुझकर छोड़ दिये गये।
और अंत में...
प्रेस क्लब के चुनाव में इस बार एक अखबार मालिक की रूचि को लेकर चर्चा गर्म है इस बार प्रेस क्लब में वे अपने रिपोर्टरो को प्रमुख पदों पर बिठाने लालायित है और इसकी रणनीति तैयार की जाती है। पहली बैठक हो चुकी है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

पद की बढ़ती लालसा...


ऐसा नहीं है कि  राजनीति में ही पद के लिए सब कुछ होता है। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में भी पद के लिए कुछ भी करेगा वालों की कमी नहीं है।
छत्तीसगढ़ में पत्रकार के संगठनों की कमी नहीं है और कई लोग तो इसे दुकानदारी तक बना चुके है लेकिन रायपुर प्रेस क्लब अब भी सबसे प्रतिष्ठित है। लेकिन हाल के सालों में इस पर भी पद लोभ का जो रंग चढ़ा है वह आश्चर्यकर देने वाला है। कभी हाथ उठाकर पदाधिकारी बनाने वाला यह क्लब चुनाव के झंझटो में पड़ गया है तो इसकी वजह पद की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना नहीं तो और क्या है।
पिछले डेढ़ दो दशकों से तो ज्यादातर यह हुआ है कि जिसने भी पद पाई वह चुनाव को टालने की कोशिश में रह गया। और नियत समय में चुनाव नहीं कराने की वजह से हंगामा की स्थिति बनी। इसकी एक प्रमुख वजह वरिष्ठ पत्रकारों की प्रेस क्लब से दूरी बना लेना भी है। तो कुछ लोगों की गुटबाजी भी है।
इस बार भी नियत समय में चुनाव नहीं होने पर जब सदस्यों ने दबाव बनाया तो चुनाव की तिथि घोषित कर दी गई।
प्रेस क्लब का चुनाव 30 मार्च को है और अगला चुनाव सही समय पर हो इसे लेकर भी चिंता है। सबसे बड़ी चिंता उन्हें है जो हर हाल में पद चाहते हैं इसके लिए घेरेबंदी भी शुरू हो गई है।
हालांकि कई लोगों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन कहा जा रहा है कि पहले पदों पर रहे लोग इस बार फिर से सक्रिय हो गये हैं। इनकी सक्रियता की वजह पुन: पद पर आना है।
हालांकि पिछला अनुभव स्पष्ट हैं कि जिसने भी दोबारा पद पाया है उसने नियम समय में चुनाव नहीं कराया है इसके बाद भी अच्छे पत्रकारों की प्रेस क्लब से दूरी की वजह से वह सब होने लगा है जो नहीं होना चाहिए।
राजधानी बनने के बाद बढ़ी प्रतिस्पर्धा से कई पत्रकारों को किसी तरह नौकरी बचा लेने की चिंता है तो कोई विवाद से दूर रहना चाहता है यही वजह है कि ऐसे लोग सक्रिय हो जाते हैं। जो पत्रकारिता की बजाय पद से अपनी छवि बनाना चाहते है।
प्रेस क्लब में मोटे तौर पर 40-50 पत्रकार ही नियमित रूप से आते हैं इनमें से ज्यादातर प्रेस कांफ्रेंस के दिनों में ही दिखते है बाकी फोटोग्राफरों का समूह होता है जिन्हें अपने काम से मतलब होता है। एक समूह सिर्फ समय काटने पहुंचता है तो कुछ यहा कदा खबरों के फेर में आते हैं। ऐसे में करीब चार सौ सदस्यों वाले एस प्रेस क्लब की चिंता को लेकर कुछ लोग ही दुबले हो रहे है। तो इसकी परवाह भला कौन करे।
वरिष्ठ व सम्मानित पत्रकारों की आवाजाही नहीं के बराबर है वे आते भी है तो तभी जब कोई आयोजन हो। ऐसे में स्वेच्छाचारिता तो बढ़ी ही है पठन-पाठन में भी रूझान कम हुआ है। आजकल तो खबरों पर कम दूसरी बातों पर ही चर्चा अधिक होती है।
और अंत में...
प्रेस क्लब की सदस्यता को लेकर विवाद गहराता रहा है। काफी अरसे से नये सदस्य नहीं बनाये जा रहे हैं और इस बार भी चुनाव पुराने सदस्यों के हिसाब से ही होना है ऐसे में नये सदस्यों का क्या होगा। अब तक तो वे बेरोक टोक प्रेस क्लब आ ही रहे हैं।

सोमवार, 3 मार्च 2014

ये तो होना ही था...

प्रेस क्लब में अंतत: चुनाव की तिथि घोषित हो ही गई। 30 मार्च को होने वाले चुनाव के लिए सदस्य 8 माह से लगे हुए थे लेकिन पदाधिकारियों को बहाने बाजी के चलते चुनाव टलता ही जा रहा था इधर पदाधिकारियों से नाराज सदस्यों ने दबाव बनाया तो एक-एक कर पदाधिकारी इस्तीफा देने लगे और जब सदस्यों ने 2 मार्च को आामसभा बुलाने का आग्रह नोटिस बोर्ड में चिपका दिया तो फिर पदाधिकारियों को मजबूरन बैठक बुलानी पड़ी। बैठक में हंगामे के पूरे असार थे लेकिन जब बैठक शुरु हुई तो कॉकस ने मोर्चा संभाल लिया। पिछली बार भी यही हुआ था अनिल पुसदकर के पांच साल के कार्यकाल को  माफी दे दी गई और इस बार भी वहीं हुआ और तय हुआ कि एक समिति बना दी जाए जो 30 मार्च को चुनाव करा देगी। सदस्यों का गुस्सा हटा या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन सारा कुछ पूर्ण निर्धारित तरीके से सम्पन्न हो गया। अब देखना है कि 30 की सामान्य सभा में क्या होता है।
बड़े से टकराओंगे
चूर-चूर हो जाओगे।

पूरे देश को अपना बंधु मानने वाले अखबर के पत्रकार को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि बटाविया जैसे दिग्गज धंधेबाज से टकराना इस कदर भारी पड़ेगा कि उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। आखिर बटाविया छोटा मोटा खिलाड़ी तो है नहीं उसकी गिनती नौ रत्नों में होती है।
अब यह पत्रकार जगह-जगह अपनी पीड़ा बताते घुम रहा है। प्रेस क्लब ने भी इसे पत्रकार के घर जबरिया पुलिस घुसने की निंदा जाहिर की थी। पदाधिकारियों को भी खामोश रहने का संकेत दिया गया। ऐसा पहले भी हो चुका है आजकल विज्ञापन के दबाव में अखबार मालिक पत्रकारिता के मूल्यों को ताक पर रखते हैं। इससे पहले जनसंपर्क के खिलाफ खबर छापने पर एक पत्रकार की नौकरी जा चुकी है।
जितना बड़ा बैनर
उतना बड़ा पैकेज

लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। राजनैतिक दल अपने हर गतिविधियों का प्रमोशन चाहते है और इसके लिए नामचीन अखबारों के पत्रकारों को खबर के साथ बहुत कुछ देने लगे हैं। खबर है कि पिछले दिनों ऐसे ही लेन देन को लेकर संझट हो गया उसे ज्यादा मुझे कम को लेकर मुंह  फुलने फुलाने का कवायद चल रही है। ऐसा ही नजारा विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था जब एक बड़े बैनर को पता चला था कि उसे कम पैकेज दिया गया। खबरें उल्टी लगने लगी और फिर बाद में मामला सेट किया है।
छोटे बैनर वाले तब भी हताश व निराश थे लेकिन इस बार कुछ छोटे बैनर वाले बैठक कर चुके हैं कि किस तरह से दबाव बनाया जाए। शहर के मध्य स्थित एक होटल में रात के डिनर के साथ हुई बैठक तो जोरदार रही लेकिन दबाव कितना जोरदार होगा कहना कठिन है।
और अंत में...
30 मार्च को होने वाले प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर इस बार जबरदस्त मोर्चेबंदी होने लगी है। कुछ पुराने पदाधिकारी भी चुनाव लडऩा चाहते है लेकिन पिछले दो कार्यकाल को लेकर जो बदनामी हुई है उसकी वजह से हार का डर साफ दिखने लगा है। कई तो अभी से कहने लगे है कि मुझे दुबारा नहीं लडऩा तो कुछ कह रहे हंैं इस बार नहीं लडऩा।


बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

पत्रकारों का पेंशन और प्रेस क्लब


पत्रकारों की मांग पर सरकार ने पेंशन देने की घोषणा की तो सभी पत्रकार खुश थे उन्हें लगने लगा था कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा लेकिन योजना की शर्तों से उनकी खुशी काफूर होने लगी है। योजना कहां से और कैसे बनी इनके नियम शर्ते कहां से आये इस पर सवाल उठने लगे है। जितनी मुंह उतनी बातें होने लगी है। पत्रकारों में इस बात की चर्चा खूब है कि सरकार ने पेंशन योजना की शर्तों में जनसंपर्क के कुछ अधिकारी और अखबार मालिकों की सलाह मान ली जिसकी वजह से कुछ ऐसी शर्ते जोड़ी गई ताकि कम से कम पत्रकारों को इस योजना का लाभ मिले। मजिठिया आयोग की सिफारिश लागू करने में आनाकानी करने वाले अखबार मालिकों की बात छोड़ भी दें तो ऐसे अखबार मालिकों की कमी नहीं है जो अपने अखबार में काम करने वाले पत्रकार को अपना कर्मचारी नहीं मानते ऐसे में पेंशन योजना की नियुक्ति पत्र की शर्ते कैसे पूरी हो पायेगी।
हालांकि पत्रकारों ने भी रास्ता अख्तियार कर लिया है और संपादक से लिखवाने लगे है कि पूर्णकालिन कर्मचारी न ही कम से कम यह तो लिख दें कि कुछ महीने या साल से काम कर रहे हैं। इसके बाद भी आवेदनों में कमी बेहद कमी है।
प्रेस क्लब का विवाद...
जब से छत्तीसगढ़ राज्य बना है प्रेस क्लब के पदों पर बैठने की होड़ मची हुई है। रायपुर प्रेस क्लब का अपना रूतबा है और इसी रूतबे को भुनाने में कुछ पत्रकार लगे हैं। हालांकि यह कोई गलत भी नहीं है लेकिन गलत तब होता है जब पदाधिकारियों की लालच बढ़ जाती है। पद का मोह अच्छे अच्छों का ईमान डिगा देता है। इससे पहले अनिल पुसदकर और गोकुल सोनी को तो पद का इतना मोह था कि वे पांच साल जंमे रहे। सदस्यों को मुहिम चलानी पड़ी। समिति गठन करना पड़ा तब कहीं बड़ी मुश्किल से चुनाव हुए। चुनाव में बृजेश चौबे अध्यक्ष बने तो उनका भी पद का मोह जाग गया। अन्य पदाधिकारी भी चुनाव ही नहीं कराना चाहते। महासचिव विनय शर्मा हो या उपाध्यक्ष के के शर्मा, सभी अपने को पदों पर चिपकाये हुए हैं। कार्यकाल समाप्त हुए साल बित गये पर कुर्सी से चिपकने का मोह नहीं छुट रहा है।
सुशांत राजपूत कोषाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले पहले पदाधिकारी थे फिर एक-एक कर अध्यक्ष को छोड़ सब इस्तीफा देने का दावा कर रहे हैं लेकिन जैसे ही कोई कार्यक्रम होता है सभी इकट्ठे नजर आते हैं।
इस कार्यकाल में कर्मचारियों से विवाद के लिए पदाधिकारियों की पहचान बन गई है। प्रेस क्लब के कर्मचारियों से झगड़ा करते पदाधिकारियों की करतूतों पर सभी हतप्रभ हैं।
सोमा पहुंची हरिभूमि
बेहतर वेतन और बड़े बैनर का मोह भला किसे नहीं है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता दिखाने वाली सोमा शर्मा अब हरिभूमि पहुंच गई है। जबकि लोकसभा चुनाव के पहले और भी आवाशाही की चर्चा है।
और अंत में...

वरिष्ठ पत्रकार मधुकर खेर की जयंति पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अध्यक्ष को छोड़ प्रेस क्लब के पदाधिकारी गायब थे तो अनिल पुसदकर भी नजर आये। पत्रकारों की टिप्पणी थी कि वक्त पर चुनाव हो जाये बस यही खेर साहब के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

जो दिखता है वह बिकता है...



छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की अपनी पहचान है, ग्रामीण रिपोटिंग से लेकर छोटी-छोटी खबरों पर यहां के पत्रकारों की पैनी नजर के सभी कायल हैं। लेकिन व्यवसायिकता का रंग भी चढऩे लगा है। बढ़ती महंगाई के बाद भी न तो नये-नये पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन होना ही रूक रहा है और न ही खबरों के तेवर में ही कोई कमी आई है। कमी आई है तो विश्वासनियता पर और इसकी वजह प्रिंट से ज्यादा इलेक्ट्रानिक मीडिया को दोषी माना जा रहा है। जो दिखता है वहीं बिकता है के फामूर्ले पर चल रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया के इस युग में भी प्रिंट का जलवा बरकरार है तो इसकी वजह प्रकाशित होने वाली खबरों की विश्वसनियता से ज्यादा पत्रकारों की मेहनत है। वरना कुछ अखबार तो मार्केटिंग के चक्कर में विज्ञापन वाले अखबार भी कहलातें है और उन्हें इस पर कोई रंज भी नहीं है।
पत्रकारों की साहसिक यात्रा...
कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला अपने तेवर के लिए पहचाने जाते हैं। पिछले दिनों नक्सलियों द्वारा पत्रकार नेमीचंद जैन और रेड्डी की हत्या कर दी गई इससे पत्रकार बिरादरी उछेलित है और नक्सलियों के इस घटना के विरोध में पत्रकारों ने पदयात्रा की। धुर नक्सली इलाके में इस पद यात्रा के अपने मायने है और इसका दूरगामी परिणाम भी निकलने की उम्मीद है। इस पद यात्रा में रायपुर से गिरिश पंकज भी शामिल हुए जबकि बस्तर ही नहीं छत्तीसगढ़ भर के तमाम पत्रकारों ने इसे समर्थन देते हुए कई ने तो पदयात्रा भी की।
इधर उधर जाना जारी है...
राजधानी के कई पत्रकारों के साथ यह स्थिति हमेशा बनी रहती है कि आज वे कहां है कल कहां होंगे। इसी कड़ी में जहां से भी अच्छा ऑफर आये वो इधर-उधर जाने से परहेज नहीं करते। पिछले दिनों रामकुमार परमार ने अमृतसंदेश को थाम लिया तो विकास शर्मा भी विजन को अलविदा कर दिया। वैसे चर्चा यह भी है कि अभी कई और पत्रकार इधर-उधर जाने की जुगत में लगे हैं।
जबकि कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार भी प्रिंट मीडिया में जमीन तलाश रहे हैं।
और अंत में...
प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर बढ़ते असंतोष से पदाधिकारियों के इस्तीफे की कथित नौटंकी जारी है और कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव तक पदों पर बैठे रहने की मंशा भी वे यदा कदा जाहिर करते है। पदों पर बैठे रहने वालें कार्रवाई की डर से इस्तीफे की बात कर रहे हैं पर कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए बेशर्मी से कहते है कि प्रेस क्लब की इज्जत का सवाल है। पर इस बार सदस्य निलंबन का प्रस्ताव तो रख ही सकते हैं।