सोमवार, 4 मार्च 2019

पत्रकारिता इन दिनों बेहद नाजुक दौर में


कोई माने या न माने, लेकिन यह सत्य है कि पत्रकारिता इन दिनों बेहद नाजुक दौर में है, आलोचना सहन नहीं करने की बढ़ती प्रवृत्ति का सर्वाधिक शिकार पत्रकार ही हुए है। स्वयं की सत्ता स्थापित करने और पैसों की भूख ने पत्रकारिता को ऐसे अंधेरे कमरे में कैद कर लिया है जहां से रोशनी की किरणें भी बेहद बारिक हो चली है। जहां से निकलना मुश्किल नजर आ रहा है।
हमने इसी जगह पर ट्रोल आर्मी के तेवर और इससे होने वाले खतरे को लेकर विस्तार दिया था लेकिन इस दौर में पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौती खड़ा हुआ है। झूठ की चादर इतनी उजली दिखाई देने लगा है कि सच को लेकर भ्रम होने लगा है।
प्रो सरकारी तंत्र से जिस तरह से मीडिया के सच को ट्रोल करना शुरु किया उससे भ्रम तो फैला ही मीडिया की विश्वसनियता को भी कटघरे में खड़ा करने का काम किया और यह सब इतने सलीके से किया गया कि वह आदमी भी मीडिया को गरियाने लगा जिसे अपने रोजी रोटी के अलावा किसी से मतलब नहीं है। मीडिया न हुआ गरीब की लुगाई हो गई जिसके साथ आप जब चाहे कुछ कर लो।
ऐसा नहीं है कि यह सब हाल के वर्षों में हुआ लेकिन चंद सालों में इसे धारदार तरीके से इस्तेमाल किया जाने लगा। दरअसल बगैर संवैधानिक अधिकार के मीडिया ने जिस तरह से राजनेताओं, अधिकारियों और अपराधियों के गठजोड़ पर प्रहार करना शुरु किया तब से ही इन तीनों के गठजोड़ ने अपनी ईज्जत बचाने मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रहार शुरु किया।
नेताओं, अफसरों और माफियाओं के गठजोड़़ ने जिस तरह से देश में लूट खसोट की परिपाटी शुरु की उस पर मीडिया ने ही बाधा डाली कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मीडिया के बढ़ते प्रभाव से लुट खसोट में बाधाओं को बर्दाश्त करना इन गठजोड़ के लिए कठिन काम था इसलिए साजिशन मीडिया की विश्वसनियता पर न केवल सवाल उठाये गये बल्कि पत्रकारों की हत्या तक की जाने लगी है। 
अपनी छवि चमकाये रखने मीडिया की छवि को बिगाडऩे के लिए जिस तरह का षडय़ंत्र किया गया वह शोध का विषय है। ऐसे गठजोड़ ने सत्ता के दम पर सबसे पहले ऐसे मीडिया घराने को अपने जाल में फंसाया जो पैसों के दिवाने थे। उन्हें भय और प्रलोभन से ऐसी खबरों के लिए मजबूर किया गयाजो उनके हितों की रक्षा तो करे ही उनकी छवि को भी चमकाने का काम करे। इसके बाद आपराधिक कमाई से मिले धन से स्वयं का मीडिया हाउस खड़ा करने की कोशिश में ऐसे पत्रकारों को अपने जाल में फंसाया जिसके नाम का इस्तेमाल शार्पशूटर की तरह कर ले।
इन सबके बाद भी जब मीडिया को जब वे प्रभावित नहीं कर पाये तब फेंक न्यूज और ट्रोल आर्मी का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया। हालात को इस तरह से वे संचालित करने लगे कि आम आदमी की जरुरतों को नजरअंदाज किया जा सके और आम आदमी अपनी जरुरतों की बजाय उन मुद्दों में भटक जाए जिससे उनका ध्यान सरकार की तरफ से हट जाए और वे जाति, धर्म और देशभक्ति में उलझ कर रह जाए।
जन सरोकार के मुद्दे उठाने वालों को इतना ट्रोल किया जाए कि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया जाए। उसे धर्म विरोधी, देश विरोधी साबित कर दिया जाए। राजनीति, अपराधियों और अफसरों के इन गठजोड़़ की वजह से पत्रकारिता के इस नाजुक दौर में जिस तरह से खबरों की विश्वसनीयता संकट में है वह देश के हित में कतई नहीं है। मीडिया हाउस तो पहले ही बंटे थे और अब पत्रकार भी बंटे नजर आने लगे है।
और अत में...
पिछले दिनों मोटर साइकिल की दुनिया में जावा ने जब कदम रखा तो उसने पत्रकार वार्ता का आयोजन किया। पत्रकार वार्ता में भीड़ बढ़ गई और इस भीड़ से आयोजकों में उत्साह भी था तो बेचैनी भी। क्योंकि पत्रकारों को ऐसे अवसर पर दिया जाने वाले उपहार कम पड़ गये। कुछ ने इस तरह के आयोजन में चेहरा और बैनर देख उपहार बांटने पर नाराजगी भी दिखाई। पर यह नाराजगी केवल आयोजन स्थल तक सिमट कर रह गया। वहां की अव्यवस्था पर किसी भी अखबार ने कुछ नहीं लिखा।

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

ट्रोल आर्मी के निशाने पर पत्रकारिता



वैसे तो पत्रकारिता का स्वर्णीम काल कभी नहीं रहा। आलोचना हर किसी को बर्दाश्त नहीं होता वो तो मजबूरी है वरना वे आलोचना करने वालों को सरेआम पीट दे या मार तक डालें।
इन दिनों पत्रकारिता पर नये तरह के खतरे पैदा होने लगा है। नेता या अधिकारी आलोचना करने वाले पत्रकारों को सीधे पीटवाने की बजाय उन्हें देशद्रोही साबित कर भीड़ के हाथों पिटवा देने का षडय़ंत्र रचने लगे हैं।
एनडी टीवी के पत्रकार रविश कुमार की माने तो दो हजार चौदह में कोई अवतारी पुरुष आया जिसकी आलोचना नहीं हो सकती जिससे सवाल नहीं किये जा सकते और ऐसा करने वालों को देशद्रोही बता दो ताकि भीड़ उन्हें मार तक डाले।
पिछले दिनों भाजपा कार्यालय में एक पत्रकार के साथ पिटाई हुई और इस मारपीट में भाजपा के नेता फंस गये। लेकिन अब वे लोग ज्यादा सचेत हैं इसलिए वे अब खबरों पर ट्रोल करने लगे। पिछले दिनों भास्कर में छपी एक कार्टून को ट्रोल किया गया। और उस कार्टून को देश विरोधी बताते हुए अखबार को पढऩा बंद कर देने की अपील की गई। प्रवीण मैसेरी नामक इस भाजपा नेता के ट्रोल पर अन्य भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया होने लगी और यह पूरा ट्रोल आर्मी के शक्ल में तब्दिल हो गया। इनमें से कितने लोगों ने भास्कर की प्रति अपने घर में बंद की यह तो पता नहीं लेकिन कल तक भास्कर को अपना अखबार बताने वाले भाजपा नेता का इस अखबार को रातों रात देशद्रोही बता देना हैरानी भरा है।
अवतारी पुरुष का यह ट्रोल आर्मी किस तरह से पत्रकारिता पर हमला कर रहा है वह आने वाले दिनों में पत्रकारिता के लिए नये खतरे पैदा कर रहा है। भीड़ के हाथों कब कौन पत्रकार के पीटे जाने की खबरें आ जाए कहा नहीं जा सकता है।
स्वागत है दाऊजी
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सांईस कालेज में जब यह घोषणा की कि उनकी सरकार किसी का फोन टेपिंग नहीं करायेगी तो यह पत्रकारों के लिए खुशी का मौका था।
क्योंकि पिछली सरकार यानी रमन सिंह की सरकार ने जिस तरह से अपने विरोधियों का फोन टेप कराये थे उसकी वजह से कई पत्रकारों के लिए फोन पर बात करना असहज हो गया था। एक डर बना रहता था कि सरकार पता नहीं किस मामले में जन सुरक्षा कानून लगाकर जेल में डाल दें। कई नामचीन पत्रकारों के फोन ही नहीं टेप किये जा रहे थे बल्कि वे किससे मिलते जुलते हैं उन्हें खबर कहां से मिलती है इसका भी हिसाब किताब सरकार रख रही थी। एक अज्ञात भय में जीने को मजबूर थे ऐसे में जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने फोन टेप नहीं कराने की घोषणा की तो इसका चौतरफा स्वागत हुआ है। अपने राजनैतिक फायदे के लिए जिस तरह से रमन सरकार ने फोन टेप कराया वह किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक है और ऐसी कार्रवाई शर्मनाक कही जानी चाहिए।
मीटिंग की ऐसी की तैसी
राजधानी से प्रकाशित हो रहे कई नामचीन अखबारों में मीटिंग की प्रक्रिया से कई पत्रकार दुखी है खासकर सिटी रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों का गुस्सा आये दिन सार्वजनिक होने लगता है। दरअसल इस तरह की मीटिंग से समय श्रम व धन की बर्बादी के रुप में देखा जा रहा है तो कुछ गलत भी नहीं है। सब काम धाम छोड़कर 11-12 बजे कार्यालय में बुलाई जाने वाली इस तरह मीटिंग में ज्यादा कुछ होता तो है नहीं उल्टे परेशानी जरुर होती है। जबकि आज हाई टेक्नोलाजी का जमाना है और इस तरह मीटिंग में टेक्नालाजी का इस्तेमाल करना भी चाहिए ताकि पत्रकारों को इस पीड़ा से निजाद मिल सके।
और अंत में...
पन्द्रह साल तक सत्ता की मलाई खाने वाले कुछ पत्रकारों में भाजपा के प्रति वफादारी का यह आलम है कि वे एक तरफ भूपेश बघेल की तारीफ के कसीदे गढ़ रहे है और भाजपा कार्यालय में केन्द्र सरकार की वापसी का दावा करते हैं।

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

वैचारिक पत्रकारिता और दलाली


वैचारिक पत्रकारिता और दलाली
यह सच है कि वैचारिक पत्रकारिता करना बहुत कठिन है। किसी एक विचारधारा के समर्थन में खड़ा होना वह भी सीना ठोंक के आसान नहीं है। वह भी तब जब आप सत्ता के बाहर हो। छत्तीसगढ़ में वैचारिक पत्रकारिता की शुरुआत कब से हुई यह कहना कठिन है लेकिन इसकी शुरुआत युगधर्म से होने की बात कही जाती है। अपना पक्ष रखने दक्षिणपंथियों ने अखबार निकाला और फिर एक विचारधारा को लेकर संघर्ष करते रहे लेकिन यह स्वीकार्य तब भी नहीं था और न ही दैनिक स्वदेश के खुलने के बाद ही स्वीकार्य हो पाया। परिणाम स्वरुप इस एक विचारधारा के साथ खड़ा रहना मुश्किल कार्य रहा इस तरह की पत्रकारिता से न केवल अखबार को खड़ा रखना मुश्किल है बल्कि एक विचारधारा को लेकर चलने वाले पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। यही वजह है कि सत्ता के दौरान फलने-फूलने वाले ऐसे पत्रकार सत्ता जाते ही गड़बड़ा जाते है।
ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद देखा जा सकता है। भाजपा की सत्ता जाते ही कल तक स्वयं को भाजपाई विचारधारा का समर्थक बताने वाले ऐसे अधिकांश पत्रकारों में स्वयं को भाजपा विरोधी साबित करने की होड़ सी मच गई है। कुछ तो पत्रकारिता छोड़ दूसरा काम धाम में रुचि ले रहे हैं तो कुछ कांग्रेसियों के सामने स्वयं को कांग्रेसी साबित करने में लग गए हैं। इनमें वे पत्रकार भी शामिल है जिन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत गद्रे भवन (पुराने भाजपा कार्यालय) में पनाह लेते थे या रात गुजारते थे। एक पत्रकार तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपनी नजदीकी का हवाला देते नहीं थकते और कोई भी काम करा लेने का दावा करते घूम रहा है। हालांकि यह पहले भी रमन राज में पत्रकारिता से Óयादा कमीशनखोरी का काम भी करा रहा है।
इसी तरह का एक पत्रकार जो चुनाव से पहले किसी भी सूरत में कांग्रेस की सत्ता नहीं आने का दावा करता था वह चुनाव परिणाम आते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अपने कालेज के जमाने का साथी बताता घूम रहा है।
इसी तरह 5 हजार की तनख्वाह से रायपुर में पत्रकारिता शुरु करने वाले का ठाठ इन दिनों चर्चा में है।
भाजपा की बौखलाहट...
चुनाव में बुरी तरह बौखलाई भाजपा को अब पत्रकार कांग्रेसी नजर आने लगे। पिछले दिनों भाजपा प्रभारी अनिल जैन को एक पत्रकार का सवाल इतना नागवार गुजरा कि वे प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ही एक पत्रकार को कांग्रेसी बता गये जबकि एक अन्य घटनाक्रम में भाजपा कार्यालय में एक पत्रकार की न केवल पिटाई की गई बल्कि एक महिला पत्रकार को अभद्रतापूर्वक कक्ष से बाहर निकाला गया। इस पत्रकार की सिर्फ इतनी गलती थी कि हार की समीक्षा के दौरान हंगामा कर रहे कार्यकर्ताओं की वीडियो बनाने वह बैठ गया था।
भाजपा नेताओं के शह पर हुई इस गुण्डागर्दी के खिलाफ प्रदेशभर के पत्रकार आंदोलन पर है लेकिन भाजपा नेतृत्व को इससे कोई लेना देना नहीं है। जबकि प्रेस क्लब रायपुर ने अनिश्चितकालीन धरना दे दिया है।
फर्जी के चक्कर में असली भी गये...
रमन राज में पत्रकारिता की आड़ में कई भाजपाई धंधा करने लग गये थे और फर्जी न्यूज एजेंसी बनाकर सरकार से लाखों रुपये महिना वसूल भी रहे थे। ऐसा नहीं है कि रमन राज के इस करतूत की जानकारी किसी को नहीं थी लेकिन सत्ता बदलते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जैसे ही इस करतूत की जानकारी मिली उन्होंने तुरन्त ऐसे 17 एजेंसियों का दाना पानी बंद कर दिया। कहा जाता है कि इन एजेंसियों की आड़ में कई भाजपाई लाल हो गये थे।
और अंत में...
जब से सत्ता बदली है जनसंपर्क विभाग में भी अमूल चूल परिवर्तन दिखने लगा है। एक अधिकारी के लम्बी छुट्टी पर चले जाने को लेकर चर्चा गर्म है।

गुरुवार, 12 मई 2016

स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...


स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...
यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अजय चंद्राकर मीडिया को सलाह देने की बजाय स्वयं के आचरण और करतूत को सुधारने में ध्यान लगाते।
दरअसल स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर इन दिनों अपनी करतूतों को लेकर मीडिया की सुर्खियों में हैं। प्रदेश सरकार के महत्वकांक्षी योजना ग्राम सुराज में हिस्सा ले रहे अजय चंद्राकर के रवैये को लेकर जिस तरह से बातें सामने आ रही है वह हैरान कर देने वाली है।धमकी-चमकी गाली गलौज के लिए पहले ही चर्चित अजय चंद्राकर के ग्राम सुराज में बोल इन दिनों चर्चा में है और अपने आचरण को ठीक करने की बजाय वे मीडिया को सलाह दे रहे हैं कि वे उन्हें निशाना बनाने की बजाय ग्राम सुराज जैसे अच्छे कार्य पर लिखे।
दरअसल पिछले दशक भर से चल रहे ग्राम सुराज को लेकर सरकार की पहले ही किरकिरी हो रही है ऐसे में अजय चंद्राकर के आचरण की चर्चा स्वाभाविक है। ऐसा नहीं है कि अधिकारियों की करतूतों की वजह से अजय चंद्राकर का गुस्सा फुट रहा है असल में अजय चंद्राकर अपनी इस तरह की हरकतों को लेकर पहले ही चर्चा में रहे हैं। महिलाओं से दुव्र्यवहार के अलावा दूसरे कई मामले पहले भी उठते रहे हैं। जानकारों का तो यहां तक दावा है कि अपनी इसी हरकत की वजह से ही वे पिछली बार चुनाव में पराजित हुए थे।
वैसे मीडिया को लेकर जिस तरह की सोच बनते जा रही है उसे लेकर मीडिया को भी सचेत रहने की जरूरत है। बस्तर के पत्रकारों पर जिस तरह से नक्सली और पुलिस का दबाव है लगभग खबरें न छापने को लेकर राजधानी के पत्रकारों पर मैनेजमेंट का दबाव कम नहीं है। किस मंत्री से किस अखबार मालिक का संबंधहै किसी से छिपा नहीं है। राजधानी में विज्ञापनों का दबाव के चलते खबरों का रुकना आम बात होने लगी है और इस वजह से सोशल मीडिया में भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का न केवल मजाक उड़ाया जाने लगा है बल्कि मीडिया की छवि को नुकसान पहुंचा है।
हालांकि यह बात बहुत कम लोग जानते है कि यह सारा खेल अखबार मालिक और सरकार के बीच का खेल है जिसमें पत्रकारों का कोई खास लेना देना नहीं होता। परन्तु जिस तरह से मीडिया को गरियाने या समझाने की परम्परा शुरु हुई है इसका क्या असर होगा यह भविष्य के गर्भ में है।
और अंत में...
मीडिया से खासे नाराज रहने वाले सत्ता पक्ष के एक नेता का कहना है कि दरअसल राजधानी के मीडिया घरानों का कांग्रेसियों से संबंध प्रगाढञ रहे हैं और वे यदि पावर में आये तो कईयों की दुकानदारी बंद करा देंगे और इस अभियान के तहत वे इन दिनों विकास प्राधिकरण में कमीशनखोरी का धन जमा करने में मशगूल है।

मंगलवार, 15 मार्च 2016

लिखने की दो... आजादी!


जेएनयू में कन्हैया कुमार जब लाल सलाम का मतलब समझा रहा था तब दिल्ली से दूर बैठे छत्तीसगढ़ में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहां सिर्फ लाल सलाम कहने वाले जेल में क्यों और कैसे ठूंस दिये जाते है। दिल्ली में लाल सलाम पर कानून का नजरिया अलग और छत्तीसगढ़ में अलग क्यों है। क्या इस देश में दो तरह के कानून है।
सवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य को लेकर भी उठ रहे है कि कल तक भारत में पैदा होने में शर्म महसूस होता था। कोई और ऐसा कह दे तो चड्डी वाले उसका जुलूस ही नहीं निकालते पुलिस भी मार कूट कर उसे सलाखों के पीछे डाल देती।
सवाल अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरे का बना हुआ है। सरकार किसी की भी हो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे सामान रुप से बना हुआ है। पत्रकारिता से इन बातों का सीधा संबंध हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली से दूर गांव तक आते-आते पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जाता है।
राजधानी में यह खतरे दूसरी तरह का है। यहां पत्रकारों को कोई सीधा पकड़कर जेल में नहीं डालता परन्तु उसकी नौकरी छुड़ा दी जाती है। इस खेल में पुलिस का नहीं जनसंपर्क विभाग का सहारा लिया जाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण है जब सिर्फ एक खबर पर कितनों की नौकरी चली गई कितनों के तबादले कर दिये गये। एक अखबार सारा संसार की बात हो या पत्र नहीं मित्र की बात हो राजस्थान से आये धुरंधर की बात हो या मंझोले कद की बात हो। खबरों की सच्चाई पर कम जनसंपर्क के दबाव में लिखने की आजादी पर बंदिशें लगाई गई।
कन्हैया के लाल सलाम का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है कि बस्तर में पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी है। नक्सली की आड़ में भ्रष्टाचार खूब फल फूल रहा है। सड़क-भवन के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है। नक्सलियों का डर बताकर सरकारी सेवक कार्यालयों से गायब हो जाते हैं। महिनों स्कूल नहीं लगता पर वेतन बराबर बंटता है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन का बुरा हाल है। पीडब्ल्यूडी के भवन व सड़क निर्माण का कोई हिसाब नहीं है। मनरेगा से लेकर दूसरी सरकारी योजनाएं दम तोड़ रही है और इस पर लिखने वालों को सीधे धमकी ही नहीं दी जाती जेल तक में ठूंस दिया जाता है। आरोप भी नक्सलियों से सांठ-गांठ का होता है। 
दिल्ली में जिस मस्ती से कन्हैया ने लाल सलाम कह दिया वैसा बस्तर में कोई कह नहीं सकता। जन सुरक्षा कानून मजबूती से पैर जमाये हुए है। बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल को भेजे जाने वाले मैसेज क्या यह चुगली करने के लिए काफी   नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है। परन्तु सरकार को यह सब नहीं दिखता। पर्याप्त सबूत के बाद भी सरकार की खामोशी क्या यह साबित नहीं करते कि बस्तर में पत्रकारों के साथ जो कुछ हो रहा है वह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है?
यह सच है कि इन दिनों देश भर में पत्रकारों को गरियाने का दौर चल रहा है। परन्तु इसके लिए जिम्मेदार क्या सरकार-प्रशासन और वे मीडिया हाउस नहीं है जो दबाव में है। जो अपने हितों के लिए पत्रकारों को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें खबरों पर स्वयं के हित में खतरे दिखते हैं पीछे हट जाते हैं।
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गुरुवार, 3 मार्च 2016

एक बहस पत्रकारिता पर...


अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

शादी समारोह और पत्रकार


छत्तीसगढ़ पिछले हफ्ते वी आई पी शादियों के लिए चर्चा में रहा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा और प्रदेश सरकार के मंत्री द्धय बृजमोहन अग्रवाल ओर अमर अग्रवाल के यहां शादियां थी। इस शादी में बंटे निमंत्रण पत्र ओर इसमें आने वाले मेहमानों की चर्चा रही लेकिन इस समारोह में शामिल होने वाले पत्रकारों की चर्चा भी मीडिया जगत में होने लगी है।
तीनों ही शादियों के निमंत्रण पत्र पत्रकारों के रूतबे के हिसाब से बांटा गया। बैनर को प्राथमिकता तो दी ही गई। विवाह समारोह में शामिल होने गाडिय़ों के भी प्रबंध किये गये। शादी समारोह में शामिल होने वाले फोटोग्राफरों ने तस्वीरें भी खूब ली लेकिन उस तरह से नहीं छपा। सबसे बड़ी शदी का तमगा बृजमोहन अग्रवाल ले गये। अन्य समारोह से ज्यादा वीआईपी और भीड़ भी मोहन भैया ने ही खीची लेकिन पत्रकारों को आने वाले वीआई पी अतिथि से बातचीत करने का मौका नहीं मिला। कुछ पत्रकार इस कोशिश में लगे भी रहे लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। हां वीआईपी लोगों के खुशामत करते स्थानीय नेताओं की तस्वीरें भी कैद करने में फोटो ग्रफर सफल हो गये लेकिन किसी की यह सब छप नहीं पाया।
नवभारत में फिर 
तनाव शुरू...
नवभारत में रंगा-बिल्ला की जोड़ी अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रहे हैं जिसके चलते एक बार फिर कर्मचारियों में आक्रोश पनपने लगा है और वे इस बार आर पार की लड़ाई करने के मूड में है तो क्रानिकल वाले इसका इंतजार कर रहे हैं।
वेतन को लेकर 
माथापच्ची...
पत्र नहीं मित्र बताने वाले एक अखबार में वेतन को लेकर फिर संकट शुरू हो गया है। यहां के कर्मचारी टाईम पर वेतन नहीं मिलने का रोना तो रो रहे हैं लेकिन सामने आकर कुछ करने की हिम्मत नहीं है। फिर मालिकों के दलालों की भी कमी नहीं हैं इसलिए अपनी व्यथा दबी जुबान पर कर रहे हैं।
पिकनिक और मजा 
हर साल की तरह इस बार भी प्रेस क्लब परिवार 26 जनवरी को मनोंरजन भ्रमण पर निकले थे। रतनपुर महामाया के दर्शन से अभिभूत पत्रकार जब कानन पेंडारी पहुंचे तो सोमवार होने की वजह से ताला लगा था। वहीं कुछ देर बिताने के बाद कई नाराज लोग होटल पहुंचे तो रात के खाने की व्यवस्था से कानन पेड़ारी नहीं घूम पाने का दर्द भूल गये। हर बार की तरह इस बार भी पत्रकार परिवारों ने खूब मजा किया।
दबंग की दंबगई 
राजधानी से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ने एक ही बार में कई पत्रकारों को चलता कर दिया। अचानक नौकरी जाने की मुसिबत से पत्रकार दुखी हैं और वे इसकी शिकायत भी कर रहे है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है।
पहल एक नई सोच
 पत्रिका का विमोचन
रायपुर। डी.एड. प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा के दूरस्थ प्रशिक्षण डी.एड.के प्रशिक्षार्थियोँ द्वारा पहल एक नई सोच नामक पत्रिका का विमोचन प्रशिक्षण केन्द्र शा.उच्च. मा. वि. पिथौरा मेँ किया गया। जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार पटनायक, विशिष्ट अतिथि पी.एस. श्याम प्राचार्य डाइट महासमुन्द, एम.डी. प्रधान सेवानिवचत प्राचार्य, एम.के. दास प्राचार्य प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा ने सभा को संबोधित किया। केन्द्र समन्वयक शंकर गोयल ने इसे एक अभिनव पहल बताया वहीं संपादक इंदीवर वैष्णव ने पत्रिका पर प्रकाश डाला। सहसंपादक सुन्दर लाल डडसेना ने पत्रिका को एक नई सोच को संज्ञा के अनुरुप बताया तथा नीरज दास ने आभार प्रकट किया। पत्रिका को प्रकाशित करने मेँ सभी प्रशिक्षार्थियों का प्रत्यक्ष एवं परोख सहयोग रहा।
और अंत में...
प्रेस क्लब का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहा है कई पदाधिकारियों की धड़कने तेज होने लगी है। व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं होने से कई नारा जो हैं।