गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

जमीन लेने मची होड़...


इन दिनों राजधानी से निकलने वाले कई अखबार मालिकों में जमीन लेने की होड़ मची है । नई राजधानी में जमीन के लिए आवेदन देने का सिल-सिला भी शुरू हो गया है इनमें वे अखबार भी शामिल हैं जो पहले ही जमीन ले चुके हैं । हालांकि अभी तक सरकार की तरफ से कोई निर्णय नहीं हुआ है लेकिन आवेदन पहले से ही लगाये जा रहे हैं । जमीन लेने में व लीज की शर्तो का उल्लंघन करने में माहिर अखबारों की यहां कमी नहीं है । ओर ऐसे अखबार मालिक इस चुनावी साल का भरपुर फायदा उठाने अधिकारियों पर दबाव भी बना रहे है ।
ज्ञात हो कि रजबंधा तालाब पाटकर अखबार वालों को जमीन दी गई है । कहने को तो जमीन अखबार चलाने दी गई है लेकिन काम्प्लेक्स बनाये गये और दूकाने तक बेची जा रही है लेकिन इनके दबाव के आगे कार्रवाई तो दूनर टैक्स तक ठीक से वसूले नहीं जा रहे हैं ।
सुप्रीम कोर्ट के तालाब को लेकर दिये गये निर्देशों के स्पष्ट उल्लंघन के बाद न तो जिला प्रशासन ही कार्रवाई को तैयार है और न ही निगम द्वारा ही कार्रवाई की जा रही है ऐसे में नई राजधानी में इन्हें जमीन दिया जाना कहां तक उचित है यह सरकार ही जाने ।
 चौबे अब साधना में...
छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोसियेशन के संस्थापक सदस्य नितिन चौबे अब साधना न्यूज़ (मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़) के वाइस प्रेसिडेंट हो गये हैं। आज रात दिल्ली से लौटने पर एसोसियेशन के कार्यालय में नितिन का आत्मीय अभिनन्दन किया गया। छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोसियेशन से जुड़े सभी चैनल के ब्यूरो चीफ़, संवाददाता, रिपोर्टर और कैमरा पर्सन ने नितिन को दिल से बधाइयां देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की है। इसके पहले नितिन नेशनल चैनल जी.एन.एन. न्यूज़ के ब्यूरो चीफ़ थे।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

क्रिकेट का घालमेल-पत्रकारों का निकला तेल।


प्रेस क्लब के द्वारा आयोजित क्रिकेट स्पर्धा ने नया इतिहास रचा है। मैज जीतने उतरी कई टीमों की करतूत न केवल शर्मनाक रही बल्कि पदाधिकारियों की जैसे-तैसे मैच कराने की कोशिश ने इस टुर्नामेंट को न केवल विवादास्पद बना दिया बल्कि ऐसे आयोजन पर ही सवाल उठा दिया।
दरअसल 23 अक्टुबर को अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी चुनाव नहीं कराने वाले पदाधिकारियों के कुर्सी प्रेम की वजह क्या है यह तो वही जाने लेकिन क्रिकेट के बहाने राजनीति ने प्रेस क्लब की मर्यादा को ठेस पहुंचाने में कई पत्रकार भी पीछे नहीं रहे।
कहने को तो स्पर्धा में बीस टीमों ने हिस्सा लिया लेकिन ऐसी कोई भी टीम नहीं थी जिनके पूरे खिलाड़ी प्रेस क्लब के सदस्य हों। यदि प्रेस में काम करने वालों को खेलने की छूट को आधार मान भी लिया जाए तब भी क्रिकेट के नाम पर जो तमाशा हुआ उसकी जिम्मेदारी से न तो पदाधिकारी ही बच सकते है और न ही पत्रकार ही अपने को निर्दोष बता सकते हैं।
प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के इसी लिजलिजे रवैये के चलते कई टीमों ने मैच जितने लिए शर्मनाक खेल खेला और ऐसे लोगों को अपनी प्रेस के बैनर तले मैदान में उतारा जो न केवल प्रोफ़ेशनल खिलाड़ी थे बल्कि उनका प्रेस क्लब या अखबार के दफ़्तर से कोई लेना देना रहा। मैच जीतने के लिए किए इस कृत्य को लेकर सदस्यों में बेहद आक्रोश है लेकिन आश्चर्य का विषय तो यह है कि अपनी मनमानी पर उतारु पदाधिकारियों ने जानकारी के बाद ऐसे लोगों को न केवल खेलने दिया बल्कि ऐसी टीमों को संरक्षण भी दिया। जबकि कायदे से उन टीमों को जिन्होने प्रेस कर्मचारियों को छोड़ दूसरी जगह से खिलाड़ी मंगाए थे उन्हे ब्लेक लिस्टेड कर देना था। यहां तक कि जो टीम फ़ायनल जीती वह भी एक ऐसे खिलाड़ी के खेल से जीती जो प्रेस का कर्मचारी ही नहीं है।
सद्भावना के नाम पर भले ही इस शर्मनाक पहलु को नजर अंदाज कर दिया जाए लेकिन सामान्य सभा में यह मुद्दा जरुर उठेगा जिसका जवाब पदाधिकारियों को देना ही होगा।
आसिफ़ पहुंचे फिऱ प्रेस क्लब।
पंद्रह दिन पहले ही प्रेस क्लब से अलग होकर एसोसिएशन बनाने वालों के कैरन क्लब का उद्घाटन  करने वाले वरिष्ठ पत्रकार आसिफ़ इकबाल का क्रिकेट मैच के फ़ायनल में पहुंचना चर्चा का विषय रहा। पदाधिकारियों की करतूतों पर नाराज बताए जा रहे आसिफ़ इकबाल की प्रेस क्लब के कार्यक्रम में उपस्थिति से नए बने एसोसिएशन को झटका भी लगा है।

पिकनिक नहीं तो गायब


सालों के बाद इस बार 26 जनवरी को प्रेस क्लब के द्वारा आयोजित पिकनिक ले जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। पिकनिक नहीं ले जाने की असली वजह किसी को समझ नहीं आ रही है। लेकिन इसके टलने से जनसम्पर्क विभाग सबसे ज्यादा खुश है तो गैर सदस्य दुखी है। वैसे भी पिकनिक में प्रेस क्लब सदस्य कम जाते थे, गैर सदस्यों की संख्या अधिक होती थी।
पिकनिक कार्यक्रम रद्द होने का प्रभाव आगे क्या होगा यह तो पदाधिकारी ही जाने लेकिन 26 जनवरी को प्रेस क्लब के झंडा वंदन कार्यक्रम में बामुश्किल दर्जन भर लोग पहुंचे। कई पदाधिकारी गायब थे और जो पदाधिकारी पहुंचे थे उनमें से कईयों को घर जाने की जल्दी थी।
प्रेस क्लब और क्रिकेट
प्रेस क्लब द्वारा आयोजित क्रिकेट मैच को लेकर इन दिनों चर्चा का गर्म है। अधिकांश टीमों में गैर सदस्यों का दबदबा है तो वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले भी इसमें भाग ले रहे हैं। जबकि इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले अपना संगठन अलग बना चुके हैं।
वैसे भी प्रेस क्लब ऐसी संस्था बन गई है जहां गैर सदस्यों के आगे सदस्यों की नहीं चलती।
जन सम्पर्क का खेल
कहने को तो जनसम्पर्क विभाग सरकार और जनता के बीचे सेतू  का कार्य करता है लेकिन हकीकत में उसका काम सिफऱ् विज्ञापन बांटना एवं दूसरे प्रदेश के अखबारों के संवाददाताओं से जी हजुरी करवाना रह गया है। जनसम्पर्क के अधिकारियों के इस रवैये से स्थानीय पत्रकारों में रोष है पर छवि तो दिल्ली में बनती है इसलिए इसकी परवाह वे नहीं करते।
यही नहीं सरकार की छवी सुधारने में लगी यह संस्था अपनी वेबसाईट भी ठीक नहीं कर पा रही है। मुख्यमंत्री रमन सिंह जिलों का निर्माण कर रोड़ शो करके 27 जिलों में वाहवाही लूट रहे हैं लेकिन जनसम्पर्क की वेबसाईट में अभी भी 18 जिले प्रदर्शित हैं।

बढते अखबार फिऱ भी लाचार

छत्तीसगढ में होने जा रहे इस बार विधानसभा चुनाव की तैयारी  में सिफऱ् राजनैतिक दल ही नहीं मीडिया भी सक्रिय हो गया है। कई अखबार फिऱ से छपने लगे हैं तो हर माह नए नाम से अखबारों का पंजीयन भी होने लगा है। सरकारी विज्ञापन और नेताओं से विज्ञापन के लिए जोड़-तोड़ शुरु हो गई है।
एक आंकड़े के मुताबिक छत्तीसगढ़ में प्रकाशित होने वाले अखबारों की संख्या 2200 से अधिक है। इनमें से कई अखबार तो राष्ट्रीय या धार्मिक त्यौहारों पर ही भरपूर विज्ञापन के साथ प्रकाशित होते हैं।
कभी सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में अब पेड न्यूज या तोड़-मरोड़ कर खबरें प्रकाशित करने का दौर शुरु हो गया है। यह कहानी सिफऱ् छोटे बैनरों की नहीं है बल्कि बड़े नामचीन बैनरों पर भी कई तरह के आरोप लग रहे हैं। कोई अपने नाम के अनुरुप मित्रता निभा रहा है तो कोइ कोयला खदान के लिए जिद पकड़े हुए है। कहने को तो नए तेवर और नए कलेवर की वकालात हो रही है तो कईयों का काम केवल दलाली करना रह गया है।
सरकार में बैठे लोग भी ऐसे अखबारों को उनकी औकात के अनुरुप रोटी फ़ेंक रहे हैं जबकि कलम की ताकत को नजर अंदाज करते हुए ठकुरसुहाती में लगने वालों की संख्या कम नहीं है।
इलेक्ट्रानिक वालों ने जोर दिखाया
प्रेस क्लब से अलग होकर पृथक संगठन बनाने वालों ने अपनी ताकत दिखानी शुरु कर दी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन के कार्यालय में कैरम लग गया है और इसका उद्घाटन प्रेस क्लब के पूर्व पदाधिकारी और मानद सदस्य आसिफ़ इकबाल ने किया। कभी प्रेस क्लब की गरिमा के लिए लडऩे वाले आसिफ़ इकबाल पृथक बने संगठन में जाना चर्चा का विषय है।
वैसे इलेक्ट्रानिक वालों का दावा है कि अभी और भी कई नामचीन पत्रकार प्रेस क्लब छोडऩे वाले हैं। हालांकि अभी पूरी तरह इलेक्ट्रानिक वाले ही एक नहीं हो पाए हैं। ऐसे में वापसी चर्चा भी कम नहीं है।
और अंत में...
पत्रिका में पहले दिन मौदहापारा पुलिस की पिटाई की खबर छूट जाने की भरपाई दूसरे दिन की गई, लेकिन जनसम्पर्क अधिकारियों ने इस पर खूब चुटकी ली और कहने लगे कि जोश के साथ होश नहीं रखा गया तो खबरें छुटेंगी ही। किसी दिन भद्द भी पिट सकती है।

आखिर इलेक्ट्रानिक वाले अलग हो ही गये ...


यह तो होना ही था । आखिर ग्लैमर से भरे इलेक्ट्रानिक मीडिया कब तक प्रिंट मीडिया के दबदबे पर चुप रहती । इलेक्ट्रानिक मीडिया इस बात पर लंबे समय से नाराज थे कि आजकल हर नेता - अधिकारी इलेक्ट्रानिक मीडिया के ग्लैमर के आगे नतमस्तक है तब भला प्रेस क्लब में पिं्रट मीडिया का दबदबा क्यों नहीं है ।
दरअसल प्रेस क्लब को प्रिंट मीडिा के वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने खूब पसीना से सींचा है और सीनियरों की मेहहनत की वजह से ही रायपुर प्रेस क्लब का नाम सम्मान से लिया जाता है । ऐसे में प्रेस क्लब की गरिमा बनाये रखने की जिम्मेदारी भी कम नहीं है ।
ऐसा नहीं है कि प्रेस क्लब को तोडऩे की यह पहली कोशिश है पहले भी ऐसी कोशिश होते रही है लेकिन वरिष्ठों की प्रभावी भूमिका से तोडऩे का मसूंबा कभी पूरा नहीं हुआ ।
पुसदकर नेतागिरी की ओर
प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने पत्रकारिता छोड़ दिया है या नहीं यह तो तय नहीं है लेकिन इन दिनों बे फिरसे राजनीति करने लगे है और केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी के रायपुर का मीडिय़ा संभाल रहे हैं । यानी लड़ाई चालू आहे ।
सिमटती दूनिया-छिटकती खबरें...
कांकेर जिले के नइहरपुर ब्लॉक के आदिवासी कन्या आश्रम में हुई बलात्कार ने समूचे छत्तीसगढ़ को झकझोर कर रख दिया । घटना के विरोध में चप्पा-चप्पा बंद रहा । पर इतनी बड़ी खबर का नेशनल मीडिया में स्थान हैरान कर देने वाला है ।
नेशनल मीडिया की इस तरह की भूमिका को लेकर कमोबेश सभी राज्यों में जनमानस में नाराजगी है । काहे का नेशनल ! दिल्ली में बैठने भर से कोई नेशनल मीडिया बन जाता है ? ऐसे कितने ही आक्रोश के स्वर सुनाई पड़ते हैं ।
दरअसल संचार क्रांति के इस दौर में जैसे-जैसे दुनिया मोबाईल और इंटरनेट में सिमटती जा रही है । वैसे-वैसे खबरों की जानकारी बढ़ते जा रही है । ऐसे में समाचार पत्र या खबरिया चैनल की भूमिका भी बदली है । और व्यापार बाद हावी हुआ है । और जब व्यापार की सोच के साथ खबरें परोसी जाती है तब उन खबरों को ही प्राथमिकता दी जाती है जहां से विज्ञापन अधिक मिलते है या जहां प्रसार अधिक होता है ।
नेशनल ही नहीं राज्यों की राजधानी में बैठे मीडिया का भी यही रवैया है । खबरों की अधिकता और जगह की कमी की वजह के अलावा व्यापारिक फायदे ने कई बार खबरों के साथ अन्याय तो किया ही है पाठकों की सोच को भी बदला है । जब पूरे मामले का दारोमदार वे राज्य सरकार के ऊपर छोड़ते है तो खुद क्षमा क्यों मांगते हैं और अगर वे यह साफ करने की कोशिश करते हे कि उन्हौंने माननीय आधार पर क्षमा मांगा है तो क्या मानवीय आधार का क्षेत्रफल उनके क्षमा मांगने तक विस्तारित है, या सिमित है ? बात यह भी है कि अगर वे मान लेते है कि इस आरपी एफ कार्यवाही दौरान निर्दोष मारे गए है तो क्या देश गृहमंत्री के पद पर सुशोशित चिदंबरम द्वारा एक भी निर्दोष के मौत बाद केवल क्षमा मांग लेना भी उचित प्रतीत होता है ? देखा जाए तो अपने तरह का यह पहला मामला है जब किसी निर्दोष सोचना है कि काश इस मुद्धे पर चिदंबरम खामोश ही रहते तो कितना अच्छा होता, पर चिदंबरम भी क्या करें ना बोले तो क्यूं और अब बोल दिए तो क्यों ?
दरअसल उक्त विषय में जाग्रत पार्टी के लामबंदी बाद चिदंबरम ने कहा है कि अगर इसमें निर्दोष लोग मारे गए है तो वह इसके लिए मानवीय आधार पर क्षमा मांगते है ! उन्हौंने यह भी कहा है कि कानून व्यवस्था राज्य का विषय है यह भी कहते है कि इस पर अन्तिम फैसला लेने का हक सरकार का है सवाल यह है कि राज्यों की बड़ी खबरों को लेकर आम पाठकों का नेशनल मीडिया के प्रति जो सोच है । कमाबेश वही सोच राज्यों की राजधानी की मीडिया के प्रति ब्लाक या जिला के पाठकों का है ।
यही वजह है कि नेशलन मीडिया पर राज्यों की राजधानी की मीडिया के प्रति लोगों का आक्रोश बढ़ा है । हालांकि यह भी सच है कि कई बार बड़ी खबरों की जानबुझकर उपेक्षा की जाती है ।
और अंत में ...
सूचना के अधिकार के तहत जूटाये गए साक्ष्य पर जब एक पत्रकार ने खबर बनाने की सोची तो अखबार के संपादक ने अपने स्लोगन सुनाते हुए पत्रकार को ही फटकार लगा दी । यानी स्लोगन में मित्र यूं ही नहीं है ।

ये कैसी सूचना क्रांति का दौर है...


एक तरफ जब सूचना क्रांति के इस दौर में दुनिया भर की खबरे आसानी से मिल जाने का दावा किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ प्रिंट मीडिया के एडिशन के चक्कर में पड़ोसी जिले की खबरों से अनजान होने का खतरा बढ़ चुका है। जितना बड़ा अखबार उतना ज्यादा एडिशन ने सूचना क्रांति के दावों की पोल खोल कर रख दी है।
छत्तीसगढ़ में स्थापित अखबारों को इससे कोई मतलब भी नहीं रह गया है नवभारत पत्रिका भास्कर हरि भूमि नई दुनिया जैसी अखबारों का राजधानी से प्रकाशन हो रहा है। कहने को ये छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक प्रसार वाले अखबारों का तमगा लिये बैठे हैं लेकिन एडिशन के चक्कर में खबरे सिमट कर रह गई है। रायपुर वालों को पड़ोसी जिले की खबरे ठीक से नहीं मिलती तो पड़ोसी जिले को राजधानी की खबरें ठीक से नहीं मिल पाती।
सूचना क्रांति के दौर में इस गड़बड़झाले से लोग हैरान है और वे अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं तो आश्चर्य नहीं है।
अब तो पत्रकार वार्ता लेने वाले लोग भी पत्रकारों से निवेदन करते हैं कि उनकी खबर ऐसी जगह लगाये जिसे पूरे छत्तीसगढ़ भर के लोग पढ़ सके। एडिशन के इस चक्कर की वजह से अच्छी बातें भी लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है लेकिन इससे मीडिया जगत को कोई लेना देना नहीं है।
हर जिले या ब्लॉक के लिए अलग एडिशन की वजह सिर्फ और सिर्फ  विज्ञापन की भूख होकर रह गई है। और इस वजह से पाठकों को पता नहीं चल पाता कि पड़ोसी जिले में सरकार की क्या करतूत है या लोगों के साथ न्याय-अन्याय कैसा हो रहा है।
छत्तीसगढ़ के मीडिया जगत में एडिशन के इस चक्कर ने ग्रामीण रिपोटिंग को भी ध्वस्त कर दिया है इसकी वजह से गांवों के विकास में सहायक योजनाएं भी दम तोडऩे लगी है।
एडिशन को लेकर भले ही अखबार वाले खुश हो लेकिन इससे होने वाले नुकसान की भरपाई मुश्किल है।
और अंत में..................
इन दिनों राजनैतिक गलियारें में एक चर्चा जोरों पर है कि जो बादल गरजते हैं वे बरसते नहीं लेकिन जो गरजते हैं वे जल्दी सेट जरूर हो जाते है।

दबाव पर भारी पड़ते प्रतिस्पर्धा...


इन दिनों राजधानी के बड़े मीडिया समूह में प्रसार संख्या बढ़ाने की होड़ मची हुई है कोई प्रदेश में स्वयं को नम्बर वन बताने लगा है तो कोई राजधानी में अपने को नंबर वन बता रहा है । नबंर वन बनने की इस प्रतिस्पर्धा में उपहार तो बांटे ही जा रहे हैं विज्ञापन दरों पर भी समझौते हो रहे हैं । ऐसे कार्यक्रमों में मीडिया पार्टनर बने जा रहे हैं जिनके आयोजकों पर उंगली उठ रही है ।
यह प्रतिस्पर्धा खबरों पर भी दिखने लगी है । लेकिन कुछ खबरों पर विज्ञापन की मजबूरी भी झलकने लगी है । खबरों से संस्थान के नाम गायब हो जाते है या फिर खबरें छायावाद पर बन जाती है  ।
इस सार्धा से पत्रकार बिरादरी खुश है कम से कम उन्हें रूटीन की खबर पर दबाव नहीं फेलना पड़ रहा है । यह अलग बात है कि राज बनने के बाद ग्रामीण रिर्पोटिंग व खोजी पत्रकारिता को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा है ।
कभी- सर्वाधिक ग्रामीण रिपोटिंग प्रकाशित करने वाला देशबंधु प्रसार में पीछे छूट गया है तो इसकी वजह कहीं न कहीं विज्ञापनदाताओं का दबाव ही है ।
सरकार केविज्ञापन का दबाव तो अब भी कम नहीं हुआ है अब तो पत्रकार बिरादरी भी सरकार के कई किस्से सुनाते नहीं थकते । पत्रिका को पास जारी नहीं करना भी सरकारी दबाव का एक हिस्सा है । वैसे भी कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीन लेकर कार्मशियल उपयोग की गलती हो तो दबाव तो झेलने ही पड़ेंगे । लेकिन कई अखबार वाले तो केवल सरकारी विज्ञापन के लालच में ही दबाव झेल रहे है ।
मजे में ब्यूरों
छत्तीगढ़ से निकलने वाले पत्र पत्रिकाओं से ज्यादा मजे में दूसरे प्रदेश से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकारों के मजे है । विज्ञापन भी इन्हें खूब मिल रहा है और घूमने-फिरने के लिए जनसंपर्क से वाहन भी उपलब्ध हो जाते हैं ।
अब यह अलग बात है कि पत्रकारों के सत्कार में जितने पैसे खर्च नहीं होते उससे अधिक का बिल बन जाता है ।
रिश्तेदारी पर प्रहार...
भले ही इसे प्रतिस्पर्धा का नाम दिया जाये पर सच तो यह है कि अपने को मालिक का रिश्तेदार बताकर धौंस जमाना एक पुलिस अधिकारी को भारी पडऩे लगा हैं अब इसी अखबार के रिपोर्टर नाराज हैं और ढूंढ-ढूंढ कर खबरें बनाई जा रही है । आखिर थाने में रोज की करतूत कम नहीं है । यानी रिपोर्टर की जय हो ।
और अंत में ...
छत्तीसगढ़ में स्थापित होने छल-प्रपंच करने वाले एक अखबार को अब विज्ञापन वाला अखबार कहा जाने लगा है । आखिर इतना बड़ा काम्प्लेक्स कोई यूं ही खड़ा नहीं करता ।