गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

नियंत्रण नहीं पर लाभ चाहिए...


कोलगेट कांड को दबाने के लिए जी न्यूज और जिंदल समुह में सौदे की खबर से मीडिया शर्मसार हुआ है। और यह सवाल जोर पकडऩे लगा है कि यह मीडिया पर सरकार का नियंत्रण जरूरी हो गया है! इस घटना में न तो जिंदल समूह के भ्रष्टाचार कम आंके जा सकते है और न ही जी न्यूज की इस खेल को ही नजर अंदाज किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने से पहले यहां की पत्रकारिता को जो सम्मान मिलता रहा है ह उसमें कमी आई है। राज्य बनने के बाद मीडिया मैनेजमेंट का नया खेल शुरू हुआ है जिसमें बड़े-बड़े मीडिया समूह भी शामिल हो गये है। वे या तो खबरों के एवज में सीधे रकम ले रहे हैं या फिर विज्ञापन को माध्यम बता रहे है। पेड-चूज का यह आलम है कि सभी नेता व कार्पोरेट घराने इस खेल में शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ में बड़े अखबार समूहो ने सरकार से फायदे के सीधे रास्ते के अलावा अप्रत्यक्ष फायदे का खेल शुरू कर दिया अखबार के अलावा दूसरे धंधो में सरकार से फायदा लेने का तिकइम जनता के सामने है। अखबार चलाने के नाम पर कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीने ली गई और उस पर कामर्शियल काम्प्लेक्स तक ताने गये। सरकारी जमीनों के इस बेचा इस्तेमाल पर कार्रवाई करने की हिम्मत न तो किसी अधिकारी में है और न ही राजनेताओं में। इन जमीनों के लीज रेट को लेकर भी खेल चला। अखबार को सरकार से सारी सुविधाएं चाहिए। जनसंपर्क से विज्ञापन पर दबाव, वाहनों के लिए दबाव यहां तक कि घूमने फिरने तक के लिए दबाव बनाये जाते हैं।
विदेश तक घूम आये...
छत्तीसगढ़ के मीडिया बिरादरी को खुश करने सरकार विदेश तक ले जा चुकी है बैकांक- पटाया जा चुके पत्रकारों के नाम पर खूब खर्च हुए। जनता की गाढ़ी कमाई पर अपव्यय को लेकर छापने वाले पत्रकार न संपादक को यह विदेश यात्रा कभी अपव्यय नहीं लगा। और न ही उन्हें सरकारी सुविधाएं लेने में कभी हिचक हुई।

और अंत में...
पत्रकार अब सरकारी खर्चे पर किताब लिखने लगे है। सरकार से पैसा एंठने में इस नये खेल में ईमानदारी का ढि़ंढोरा पिटने वाले कई शामिल है।

प्रेस क्लब का कमाल दारू ठेकेदार का धमाल...




छत्तीसगढ़ की राजधानी में स्थित प्रेस क्लब की अपनी प्रतिष्ठा है लेकिन कतिपय पदाधिकारियों की खाओ पियों नीति ने न केवल इसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है बल्कि आम लोगों में प्रेस क्लब की छवि खराब करने की भी कोशिश हुई है ।
रायपुर प्रेस क्लब की गरिमा को इस बार ठेस पहुंचाने का काम कोई और नहीं कार्यकाल पूरा होने के बाद भी पदों पर जमें पदाधिकारियों ने की हे । प्रेस क्लब रायपुर द्वारा प्रतिष्टित लोगों के लिए प्रेस से मिलिए रूबरू और आमने सामने जैसे गरिमा पूर्ण आयोजन किया जाता है । इसी कड़ी में 17 नवम्बर शनिवार को रूबरू कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम में अब तक प्रतिभाशाली व प्रतिष्ठित लोगों को ही प्रेस क्लब अपना मेहमान बनाते आया है ।
लेकिन 17 नवम्बर के कार्यक्रम में इस कार्यक्रम की गरिमा को नजर अंदाज करते हुए
 प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने शराब ठेकेदार बल्देव सिंग उर्फ पप्पू भाटिया को आमंत्रित कर लिया ।
इस आयोजन में पदाधिकारियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया अध्यक्ष बृजेश चौबे, महासचिव विनय शर्मा और उपाध्यक्ष के.के. शर्मा जहां पप्पू भाटिया के आजू-बाजू बैठे वहीं एक अन्य पदाधिकारी कमलेश गोगिया द्वारा स्मृति चिंन्ह दिया गया । जबकि अतिथि का स्वागत सत्कार का काम सुशील अग्रवाल और राजकुमार ग्वालानी ने किया । प्रेस क्लब के इस आयोजन को लेकर सदस्यों में बेह्द आक्रोश है और सामान्य सभा में यह मुद्दा भी जोर शोर से उठेगा कि आखिर एक शराब ठेकेदार को रूबरू जैसे प्रतिष्ठा पूर्ण कार्यक्रम में  क्यों बुलाया गया ।
ज्ञात हो कि प्रेस क्लब के इन वर्तमान पदाधिकारियों का कार्यकाल 23 अक्टूबर को समाप्त हो चुका है ऐसे में प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा को बनाने की बजाय उस पर पलिता लगाने के मामले से पदाधिकारियों को जवाब देना मुश्किल हो जायेगा । जबकि कार्यकाल समाप्त होने के बाद फोटोग्राफरों के पुरस्कार वितरण में मुख्य अतिथि के लेट-लतीफी का मामला भी अभी शांत नहीं हुआ है और पुरस्कार को लेकर भी फोटोग्राफरों में नाराजगी है।
ऐसा नहीं है कि प्रेस क्लब की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश पहली बार हुई है इससे पहले भी प्रेस क्लब की डायरेक्टरी में एक अपराधिक छवि वाले लल्लू के विज्ञापन पर बवाल मच चुका है और तब भी वर्तमान अध्यक्ष पर ही आरोप लगा था ।
बहरहाल कार्यकाल पूरा होने के बाद इस तरह के आयोजन को लेकर पदाधिकारियों की करतूत चर्चा में हैं जबकि पिछली बार अनिलपुसदकर के द्वारा समय पर चुनाव नहीं कराने के कारण यही लोग हल्ला मचाते थे । अब तो यह कहा जा रहा है कि प्रेस क्लब में ऐसा क्या है जिसकी वजह से जो बैठता है  उतरता ही नहीं चाहता !
      

कल जिसे छोड़ दिया था आज उसका सम्मान ?


राज्योत्सव में आज एक और कमाल होने वाला है। राज्योत्सव के पहले ही दिन जिस महिला पत्रकार को जनसंपर्क विभाग ने तेज़ बारिश में माना के पास अकेल छोड़ दिया था , उसका सम्मान किया जाने वाला है। रायपुर के सांध्य दैनिक तरुण -छत्तीसगढ़ के अलावा आकाशवाणी रायपुर में बतौर संवाददाता कार्यरत शगुफ्ता शिरीन को स्वर्गीय चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता पुरस्कार के लिए
चुना गया है। आप सभी को बताते चलूँ- की राज्योत्सव के प्रथम दिवस जब शगुफ्ता रिपोर्टिंग के लिए सरकारी बस से नयी राजधानी के लिए रवाना हुई थी, उस बस में डीज़ल ने हो पाने के कारण यह बस एक घंटे तक पेट्रोल पम्प में खड़ी रही थी। बाद में शगुफ्ता डेढ़ घंटे बाद कार्यक्रम स्थल पहुँची और जनसंपर्क विभाग की एक महिला अधिकारी के साथ बैठ गयी . अचानक पानी गिरने से जब मीडिया - गैलरी में अफरा तफरी मची तो शगुफ्ता ने अपना बैग महिला जनसंपर्क अधिकारी को पकड़ा दिया और बारिश से बचने की जुगत में भीड़ में खो गयी। जब बारिश कम हुई और भीड़ बाहर निकली तब तक महिला जनसंपर्क अधिकारी हर्षा पौराणिक अपनी गाड़ी और शगुफ्ता का पर्स वाला बैग लेकर राज्योत्सव स्थल से जा चुकी थी। आधे से ज्यादा पत्रकार भी वहां से खिसक चुके थे . शगुफ्ता पहले तो अकेली भटकती रही फिर एक जनसंपर्क विभाग के नए नवाड़े अधिकारी से निवेदन किया की वह उसे जनसंपर्क विभाग तक पहुंचा दे। बारिश फिर शुरू हो चुकी थी , उस अधिकारी ने अपनी मोटर सायकल से शगुफ्ता को माना तक लाया और घर से काल आ जाने पर आगे जाने से मना कर दिया। पर्स न होने के कारण शगुफ्ता ने उससे और एक ग्रामीण से पैसे मांगे और ऑटो का इन्तेज़ार करने लगी। इसी बीच जनसंपर्क विभाग की एक और गाड़ी वहां से गुजरी तो शगुफ्ता ने उसे हाथ देकर रोका। इस गाड़ी के ड्राइवर ने कहा की इस गाडी में महिलाओं को नहीं सिर्फ पुरूषों को बैठाने का आदेश है , इतना कहकर ड्राइवर ने गाडी आगे बढ़ा ली। बरसते पानी में आखिर अकेली शगुफ्ता ऑटो से वापस घर आयी और रात में ही महिला जनसंपर्क अधिकारी के घर जाकर उसे खूब खरी खोटी सुनायी। सबकी एक लिखित शिकायत भी की है उसने। अब ऐसी स्थिति में अचानक उसके सम्मान से मैं व्यक्तिगत रूप से हतप्रभ हूँ . ये तो अपमान के बाद सम्मान हुआ न। शगुफ्ता के संघर्ष को सलाम और सम्मान के लिए बधाई .
फेसबुक में भड़ास...
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में अभी भी ऐसे पत्रकार है जिनकी नौकरी मजबूरी हो  सकती है लेकिन खबरों को वे अपने अखबार में न सही फेसबुक में प्रकाशित कर ही लेते है । राजधानी के दर्जनों पत्रकार फेस बुक में रोज खबरें डालते मिल जायेंगे । वहीं जनसंपर्क का किस तरह से बड़े अखबार पर दबाव है इसका भड़ास भी फेसबुक पर उतरते दिख जायेगा ।
और अंत में ....
नवभारत के राज्योत्सव सप्लिमेंट को देखकर एक प्रतिद्धंदी अखबार के  बड़े कर्मचारी का कमेंट्स था हम भी परिशिष्ट के बहाने एक ही बार में अपनी क्षतिपूर्ति कर लेंगे ।

पत्रकारिता के पुरोधा नहीं रहे ...


छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के पितृ पुरूष माने जाने वाले पंडित राज नारायण मिश्रा का निधन की खबर से उन्हें जानने वालों को दुख से भर दिया ।
अपनी विशेष लेखन शैली और दबंग पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मिश्रा जी को सभी दा के नाम से जानते थे । कभी घूमता हुआ आईना के लिए हर बुधवार को देशबंधु खरीदने के लिए मजबूर करने वाले दा ने निर्भिक पत्रकारिता को बुलंदी तक पहुंचाया । 
क्या नेता क्या अधिकारी सभी उनके कलम के कायल थे।   
   श्रमजीवी पत्रकारों को पत्रकारिता के गुढ़ रहस्य समझाने वाले दा ने ग्रामीण रिपोर्टिग में नया आयाम स्थापित किया था । उनके निधन से रिक्त हुए जगह की भरपाई हो पाना मुश्किल है । वे हमेशा याद रहेंगे । विनम्र श्रद्धांजलि ।

नैयर जी भी फेसबुक में
नौकरी से रिटार्यड मेंट के बाद बबन प्रसाद मिश्रा के बाद अब रमेश नैयर भी अपनी लेखनी से फेसबुक के पाठकों से रूबरू होंगे । अपनी कलम की धार से पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले रमेश नैयर का स्वागत ।

दूसरा साल गिरह ?
अपनी दबंग पत्रकारिता के लिए जल्द ही छत्तीसगढ़ में चर्चा में आने वाले पत्रिका समूह ने अपना दूसरा सालगिरह प्राची देसाई को पेश कर मनाया । दूसरे साल गिरह कैसे हुआ यह मैनेजमेंट का फंडा है लेकिन लोग पूछ रहे है छत्तीसगढ़ में पत्रिका को शुरू हुए दो साल कैसे हो गया ?

सुकांत का इस्तीफा ...
प्रेस क्लब के कोषाध्यक्ष सुकांत राजपूत ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया । 23 अक्टूबर को कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी चुनाव नहीं होने को लेकर उनका इस्तीफा आने की चर्चा है हालांकि चर्चा इस बात की भी है कि हरिभूमि से पत्रिका जाने के बाद उन्हें प्रेस क्लब की राजनीति से दूर रहने की चेतावनी मिली थी । सच क्या है यह तो वही जाने लेकिन चर्चा को कैसे कोई रोक सकता है ।
बड़े-बड़ो का दूम हिलाना
छोटों का जीभ लपलपाना
राज्योत्सव बनाम लुटोत्सव को लेकर सरकार ने प्रचार प्रसार के लिए लंबा बजट बनाया है । करोड़ों रूपये विज्ञापन में खर्च किये जायेगे । इसे लेकर अखबार मालिकों की लार भी टपकने लगी है । कहा जा रहा है कि बड़े अखबार वाले विज्ञापन के लिए जनसंपर्क के अधिकारियों के सामने दुम हिलाते नजर आ रहे है तो छोटे अखबार वाले जीभ लपलपा रहे है सबसे ज्यादा परेशान साप्ताहिक व मंथली वालों की है जिन्हें विज्ञापन तो मिलेगा लेकिन उनकी कीमत उनकी चाटुकारिता के आधार पर भी तय नहीं होती ।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

दबंग के आगे दबंगई दबी


छत्तीसगढ़ आते ही अपने दबंगई के लिए विख्यात पत्रिका ने भी क्या वही ढर्रा अपना लिया है । क्या दबाव के आगे वह भी झुकने लगा है या फिर मामला कुछ और ही है । राÓयोत्सव के इन्वेस्टर मीट को लेकर यह सवाल पहली बार उठा था तब इन्वेस्टर मीट तक ही मामला सुलझने की चर्चा हुई थी ।
लेकिन आतीफ असलम के कार्यक्रम  को लेकर पत्रिका के रवैये से एक बार फिर लोग हैरान है दमदार मंत्री के इस कार्यक्रम को लेकर कम प्रसार वाले अखबारों ने तो जमकर बखिया उधेड़ी । और इसे 26/11 के शहीदों का अपमान करार दिया । कई संगठन विरोध में खड़े रहे । प्रदर्शन हुआ लेकिन बड़े प्रसार वाले अखबारों में यह सब नहीं दिखा । लोगों को पत्रिका से उम्मीद थी कि कम से कम वह तो दबंग के खिलाफ दबंगई दिखायेगा लेकिन न मालूम कारणों से ऐसा कुछ नहीं हुआ । अब प्रदर्शन करने वालों के अलावा पत्रिका से उम्मीद रखने वाले भी हैरान हैं कि आखिर हर जगह दबंग की सेटिंग कैसे हो जाती है ।
नवभारत के काईम रिपोर्टरों का दुख
जिले के एक बड़े ओहदे में बैठे अफसर से नवभारत के मालिक की रिश्तेदारी से यहां के रिपोर्टर दुखी है । थोड़ी भी पुलिस की कमियां गिनाने का मतलब नौकरी से हाथ धोना है ऐसे में घटना तो छापी जायेगी लेकिन स्वयं को बचाने की चिंता भी कम नहीं है । आखिर बड़े ओहदे में बैठे यह अफसर अपनी रिश्तेदारी की याद दिलाने से पीछे जो नहीं रहता है ।
मीडिया की आंख
कहते हैं जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि । कमोबेश यही बात मीडिया के लिए भी कहा जाता है । ऐसे में भास्कर ने 26/11 की श्रद्धांजलि को लेकर जिस तरह से शिदें पवार के जूते को लेकर आपति की वह तारीफ ए काबिल है लेकिन दिल्ली तक निगाह रखने के बाद उसे रायपुर में आतीफ असलम का कार्यक्रम क्यों नहीं दिखा । यह आम लोगों में चर्चा है ? क्या यहां दबंग मंत्री की दबंगई काम कर रहा है । या मामला सेटिंग का है ।
। हिंदी अखबार- अंग्रेजी शब्द ।
देश में सबसे Óयादा पढे जाने वाले प्रमुख हिंदी अखबारों के पाठकों को धडल्ले से इस्तेमाल हो रहे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल पसंद नहीं आ रहा है। जन मीडिया.पत्रिका की ओर से करवाए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई
है। इंडियन रीडर सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर चार सबसे अधिक प्रसार वाले हिंदी समाचार पत्रों के पाठकों का मानना है कि अंग्रेजी के शब्द समाचार को बोझिल बनाते हैं और पढऩे में रूकावट पैदा करते हैं।
दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान के 70 -70 प्रतिशत, अमर उजाला के 69 प्रतिशत और दैनिक जागरण के 65 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि अंग्रेजी के शब्द समाचारों को बोझिल बनाते हैं। इन अखबारों के गांव में पढ़े जाने वाले जिला स्तर के विशेष स्थानीय खबरों में इस्तेमाल कुछ अंग्रेजी शब्दों की बानगी इस प्रकार है -फंड सेफ्टी ऑफिसर, मीडिया, रेसिंग सीन, इनोवटर्स इन हेल्थ, डल्फिन टेल, रेड जोन, नार्थ जोन कोआर्डिनेटर, कांप्रिहेंसिव ड्रेस, अर्ली मॉर्निंग, अनप्लग, एडआन, कंटेंप्ट टू कोर्ट, बियोंड टाइम और आइडेंटिफिकेशन डाक्यूमेंट।

न सूत न कपास, जुलाहों में...


यह तो न सूत न कपास जुलाहां में लठ्ठम लठ्ठा की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना छत्तीसगढ़ में मीडिया ने कभी भी अपनी मर्यादाएं लांघने की जहमत नहीं की । इन दिनों जहां एक तरफ आपसी प्रतिस्पर्धा चरम पर हे वहीं खबरों में सनसनी पैदा करने की होड़ भी मची हुई है । खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में यह Óयादा देखने को मिल रहा हैं ।
छत्तीसगढ़ में इलेक्ट्रानिक मीडिया की पूछ परख प्रिंट के मुकाबले कमजोर है । ई टी वी, सहारा, जी 24, साधना के अलावा भी यहां इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल काम कर रहे हैं लेकिन Óयादातर चैनल प्रेस कांफ्रेस और रूटीन की खबरों तक ही सिमट कर रह गये हैं Óयादातर खबरे प्रिंट मीडिया में छप चुकी होती है और नया करने के चक्कर में अपनी प्रतिष्ठा को ही धब्बा लगा बैठते हैं ।
कई चैनल तो सत्ता के गलियारे तक ही अपने को समेट कर रख छोड़ा है । ऐसे में खबरों की होड़ पीछे छूट गया है ।
इसके उलट प्रिंट मीडिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है । लेकिन चुनावी साल होने की वजह से सरकार का दबाव भी कम नहीं है । सरकार के खिलाफ जाती खबर छपी नहीं कि जनसंपर्क से लेकर भाजपा के मीडिया मैनेजमेंट करने वाले ट्रट पड़ते हैं । हालांकि यह स्थिति बड़े बैनर वाले अखबारों के साथ Óयादा है लेकिन छोटे बैनर वाले अखबारों पर भी दबाव कम नहीं है ।
अब तो कई अखबार वाले जमीन और विज्ञापन के लिए दबाव भी बनाने लगे है ।
प्रेस क्लब का काम
सी एम का झुनझूना...
रायपुर प्रेस क्लब के वर्तमान पदाधिकारियों की नींद खुलने लगी है । कार्यकाल समाप्ति के दौर में जब जागी तब सवेरा की तर्ज पर डायरेक्टरी का विमोचन और वरिष्ठ पदाधिकारियों का सम्मान किया गया ।
दोनों ही कार्य सराहनीय है क्योंकि वरिष्ठों के सम्मान में ही सबका सम्मान निहित है एक अ'छे कार्यक्रम में एक बार फिर पत्रकारों की पेशंन जैसी मांग पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का जवाब निराश करने वाला रहा । अपने ही कामों के बखान के बीच मुख्यमंत्री का पत्रकार पेंशन योजना के प्रति रवैया जोर निराशावादी है । जबकि नई राजधानी में अवासीय योजना पर उनकी चुप्पी भी ठीक नहीं रही ।
कहीं होड़ तो कहीं बेरूखी .....
वरिष्ठ पदाधिकारियों के सम्मान में प्रेस क्लब द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपने नाम देखकर कई उत्साहित थे । और कुछ एक लोग तो लालायित भी दिख रहे थे । जबकि कुछ लोग पहले की तरह अपने को इससे दूर ही रखा । इनमें से कुछ पूर्वाग्रह के शिकार है तों कुछ की वर्तमान पदाधिकारियों से नाराजगी है ।
और अंत में ...
सहारा न्यूज चैनल को रूचिर गर्ग के जाने के बाद से ब्यूरों की तलाश है । शर्ते और नियम लागू है । शिव पर डोरे डाले गये थे लेकिन वह भी छिटक गये ।

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

नियंत्रण नहीं पर लाभ चाहिए...
कोलगेट कांड को दबाने के लिए जी न्यूज और जिंदल समुह में सौदे की खबर से मीडिया शर्मसार हुआ है। और यह सवाल जोर पकडऩे लगा है कि यह मीडिया पर सरकार का नियंत्रण जरूरी हो गया है! इस घटना में न तो जिंदल समूह के भ्रष्टाचार कम आंके जा सकते है और न ही जी न्यूज की इस खेल को ही नजर अंदाज किया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ राÓय बनने से पहले यहां की पत्रकारिता को जो सम्मान मिलता रहा है ह उसमें कमी आई है। राÓय बनने के बाद मीडिया मैनेजमेंट का नया खेल शुरू हुआ है जिसमें बड़े-बड़े मीडिया समूह भी शामिल हो गये है। वे या तो खबरों के एवज में सीधे रकम ले रहे हैं या फिर विज्ञापन को माध्यम बता रहे है। पेड-चूज का यह आलम है कि सभी नेता व कार्पोरेट घराने इस खेल में शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ में बड़े अखबार समूहो ने सरकार से फायदे के सीधे रास्ते के अलावा अप्रत्यक्ष फायदे का खेल शुरू कर दिया अखबार के अलावा दूसरे धंधो में सरकार से फायदा लेने का तिकइम जनता के सामने है। अखबार चलाने के नाम पर कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीने ली गई और उस पर कामर्शियल काम्प्लेक्स तक ताने गये। सरकारी जमीनों के इस बेचा इस्तेमाल पर कार्रवाई करने की हिम्मत न तो किसी अधिकारी में है और न ही राजनेताओं में। इन जमीनों के लीज रेट को लेकर भी खेल चला। अखबार को सरकार से सारी सुविधाएं चाहिए। जनसंपर्क से विज्ञापन पर दबाव, वाहनों के लिए दबाव यहां तक कि घूमने फिरने तक के लिए दबाव बनाये जाते हैं।
विदेश तक घूम आये...
छत्तीसगढ़ के मीडिया बिरादरी को खुश करने सरकार विदेश तक ले जा चुकी है बैकांक- पटाया जा चुके पत्रकारों के नाम पर खूब खर्च हुए। जनता की गाढ़ी कमाई पर अपव्यय को लेकर छापने वाले पत्रकार न संपादक को यह विदेश यात्रा कभी अपव्यय नहीं लगा। और न ही उन्हें सरकारी सुविधाएं लेने में कभी हिचक हुई।

और अंत में...
पत्रकार अब सरकारी खर्चे पर किताब लिखने लगे है। सरकार से पैसा एंठने में इस नये खेल में ईमानदारी का ढि़ंढोरा पिटने वाले कई शामिल है।