रविवार, 17 मार्च 2019

आख़िर गोदी मीडिया आया कहाँ से

आखिर गोदी मीडिया आया कहां से...
मीडिया की भूमिका को लेकर जिस तरह से सवाल उठाये जा रहे हैं उससे एक बात तो तय है कि कहीं न कहीं मीडिया की भूमिका ठीक नहीं है। मेरी यह बात उन लोगों को कड़वी लग सकती है जो इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में काम करते हैं या इनके समर्थक है लेकिन सच तो यही है कि आज मीडिया की भूमिका को लेकर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की वजह से ही सवाल अधिक उठ रहे है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि प्रिंट मीडिया की भूमिका बहुत अच्छी है।
सरकारी विज्ञापनों की बोझ ने दोनों ही मीडिया के कामकाज के तरीके को बदला है। कभी विपक्ष की भूमिका में सरकार के खिलाफ सबसे दमदार माने जाने वाले मीडिया की भूमिका को लेकर आम जनों की शिकायतों को नजरअंदाज किया भी नहीं जाना चाहिए। खबरें रुक जाना या खबरों को नहीं दिखाने से ज्यादा खतरनाक सरकार का गुणगान करना हो सकता है।
यह बात मैं इसलिए दावे के साथ कह सकता हूं क्योंकि मीडिया की विश्वसनियता यदि घटी है तो उसकी वजह सरकार के पक्ष में खड़ा होना है। यह ठीक है कि अखबार या चैनल चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है लेकिन यदि सरकारी विज्ञापनों पर ही निर्भर होना पड़े तो पत्रकारिता पर ऊंगली उठना स्वाभाविक है।
इन दिनों पूरे देश में एक नयी बहस शुरु हुई है और यह बहस गोदी मीडिया को लेकर चल रही है। क्या सचमुच एक बड़ा वर्ग गोदी मीडिया हो चुका है जिसका काम केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि चमकाने का रह गया है? सरकारी विज्ञापनों के तले क्या पत्रकारिता की आत्मा को दबा दी गई है और बाजारवाद के इस दौर में क्या सचमुच हर चीज बिकाउ होकर रह गया है?
ये ऐसे सवाल है जो पत्रकारिता के इतिहास को कलंकित करने के लिए काफी है। सरकार के इशारे में हिन्दू मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के मुद्दे को लेकर जिस तरह से बहस कराई जा रही है उससे क्या आम आदमी की तकलीफ कहीं खो नहीं गया है।
देश में जिस तरह से किसानों और नौजवानों के बेरोजगारी का मुद्दा सुरसा की तरह मुंह खोले खड़ा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का बुरा हाल है और इस सबको छोड़ ह्दिू मुस्लिम पर बहस सिर्फ इसलिए दिखाया जाए क्योंकि इससे सरकार की छवि चमकेगी तो फिर पत्रकारिता को लेकर उंगली उठेगी ही।
आखिर यह गोदी मीडिया क्या है। अचानक रातों रात मीडिया को गोदी मीडिया क्यों कहा जाने लगा और इस आलोचना के बाद क्या मीडिया ने अपनी भूमिका बदली या सरकार की छवि बन पाई। दरअसल यह कहावत युगों से चला आ रहा है कि 'अति सर्वत्र वर्जतेंÓ। और मीडिया की सरकार की छवि बनाने की लगातार कोशिश की वजह से ही गोदी मीडिया का जन्म हुआ है। सरकार की गलतियों पर परदा डालने की कोशिश की वजह से ही गोदी मीडिया की चर्चा शुरु हुई है लेकिन जब मामला बढ़ता ही गया तो इस गोदी मीडिया की वह से मीडिया की छवि पर तो असर पड़ा ही है सरकार की इस कोशिश की भी आलोचना होने लगी है।
और अंत में...
प्रेस क्लब में आयोजित नंदन का अभिनंदन में शगुफ्ता शीरिन को छोड़ कई पदाधिकारी गायब रहे हालांकि इनके नहीं होने के बाद भी कार्यक्रम न केवल गरिमामय रहा बल्कि पत्रकारों ने देशभक्ति का गीत भी जोरदार गाया।

रविवार, 10 मार्च 2019

मीडिया की बदलती भूमिका...


वैसे तो हाल के सालों में सब कुछ बदल रहा है तब भला मीडिया की भूमिका क्यों न बदले? यह सवाल आम लोगों के जेहन में उठने लगा है तो इसकी वजह सत्ता का वह खेल है जिसमें फंसकर मीडिया के काम करने का तरीका है। इस तरीके ने पत्रकारों को अकेले खड़ा कर दिया है। या तो वे सत्ता के साथ खड़ा हो जाए या फिर अकेले हो जाए और देशद्रोही के परिधि में आ जाए क्योंकि सत्ता ने लोकतंत्र को ऐसे बना दी है कि जो सत्ता के साथ खड़ा है तब ही वह देशभक्त है।
यह सच है कि सत्ता के निशाने पर मीडिया हमेशा ही रही है और सत्ता में बैठे लोग यह कभी नहीं चाहते कि मीडिया ऐसी बातों को उजागर करे जो उनके लिए परेशानी का कारण बने।
हमने पहले ही लिखा है कि पत्रकारों के लिए स्वर्णिम काल कभी नहीं रहा सत्ता किसी की भी रही हो। उसने मीडिया पर दबान बनाने में कमी नहीं रखी। लेकिन हाल के सालों में जिस तरह से सत्ता के मायने बदले है और सत्ता ने बड़ी चतुराई से यह परोसा है कि सत्ता का मतलब ही देश प्रेम है तब मीडिया के लिए कोई और रास्ते का चुनाव कठिन होने लगा है।
पुलवामा की घटना के बाद जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमि रही वह बालाकोट के बाद तो पाकिस्तान को नेस्तनाबूत तक जा पहुंची। अधिकांश मीडिया वहीं बात करने लगी जो सरकार को पसंद हो, यहां तक कि युद्ध का विरोध करने वालों को मीडिया ही देशद्रोही साबित करने में लग गई।
जबकि किसी भी स्थिति में युद्ध आखरी विकल्प है और यह होना भी चाहिए क्योंकि इससे नुकसान दोनों पक्षों का ही होता है। लेकिन हाल के सालों में जिस तरह से मीडिया के तौर तरीके बदले हैं वह हैरान कर देने वाला है। सत्ता के पीछे खड़े होने की वजह की जब हमने पड़ताल की तो पाया कि सत्ता ने जिस तरह न केवल विज्ञापनों के माध्यम से मीडिया को साधने का प्रयास किया है बल्कि देश प्रेम की आड़ में मीडिया पर दबाव भी बनाया है। देश प्रेम के खौलते तेल में पकौड़े तलकर देश को एक ऐसे दौर में पहुंचा दिया जहां सत्ता का साथ ही देशभक्ति है अन्यथा आप देशद्रोही साबित कर दिये जाओगे। इसलिए सरकार की पसंद पर हिन्दू, मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद गाय, गंगा पर आप जितना डिबेट करोगे सरकार उतना पैसा देगी। आप एक बार सरकार द्वारा मिल रहे विज्ञापन से पैसों की लालच में फंसे तो फंसते चले जाओगे।
एक अनुमान के मुताबिक इलेक्ट्रानिक मीडिया चलाने के लिए हर साल सौ-डेढ़ सौ करोड़ की जरूरत पड़ती है और यह राशि आखिर आये कहां से? यही वजह है कि पत्रकार वह हो गया है जो सत्ता के साथ नहीं तो वह देशद्रोही हो जायेगा। कोई कल्पना कर सकता है कि मोदी सरकार में भाजपा ने दो चैनलों का बहिष्कार सिर्फ इसलिए कर रखा है क्योंकि ये चैनल किसान, मजदूर, बेरोजगारी या फसल बीमा में हुए घोटाले के मुद्दे उठाते हैं और हिन्दू मुस्लिम पर डिबेट नहीं करते।
ऐसा नहीं है कि सत्ता का दबाव सिर्फ चैनलों पर है बल्कि अखबारों पर भी साफ देखा जा रहा है। विज्ञापन देने वाली कंपनियों पर तो दबाव डाला ही जाता है साथ ही ऐसे रिपोर्टरों को नौकरी से निकालने का भी फरमान सुनाते रहे हैं। पूण्यप्रसून बाजपेयी और अमिसार शर्मा का नाम तो कोई भूला नहीं है ये नाम इसलिए चर्चा में रहे क्योंकि ये चैनल में थे लेकिन करन थापर, बाबी घोष हिन्दुस्तान टाईम्स, हरीश खरे ट्रिब्यून और जय ठाकुर इकानॉमिक्स एण्ड पोलीटिकल विकली को कोई जानता है जिन्हें सरकार के दबाव में या तो नौकरी से हटा दिया गया या इस्तीफा देना पड़ा।
हम बता दे कि करण थापर ने स्वयं स्वीकार किया था कि मोदी सरकार के दबाव की वजह से वे इन दिनों नौकरी में नहीं जबकि बाबी घोष सत्ता के अपराध पर और हरीश खरे ट्रिब्यून में आधार कार्ड पर काम कर रहे थे। जय ठाकुर ने अडानी के खिलाफ खबर छापी थी।

सोमवार, 4 मार्च 2019

पत्रकारिता इन दिनों बेहद नाजुक दौर में


कोई माने या न माने, लेकिन यह सत्य है कि पत्रकारिता इन दिनों बेहद नाजुक दौर में है, आलोचना सहन नहीं करने की बढ़ती प्रवृत्ति का सर्वाधिक शिकार पत्रकार ही हुए है। स्वयं की सत्ता स्थापित करने और पैसों की भूख ने पत्रकारिता को ऐसे अंधेरे कमरे में कैद कर लिया है जहां से रोशनी की किरणें भी बेहद बारिक हो चली है। जहां से निकलना मुश्किल नजर आ रहा है।
हमने इसी जगह पर ट्रोल आर्मी के तेवर और इससे होने वाले खतरे को लेकर विस्तार दिया था लेकिन इस दौर में पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौती खड़ा हुआ है। झूठ की चादर इतनी उजली दिखाई देने लगा है कि सच को लेकर भ्रम होने लगा है।
प्रो सरकारी तंत्र से जिस तरह से मीडिया के सच को ट्रोल करना शुरु किया उससे भ्रम तो फैला ही मीडिया की विश्वसनियता को भी कटघरे में खड़ा करने का काम किया और यह सब इतने सलीके से किया गया कि वह आदमी भी मीडिया को गरियाने लगा जिसे अपने रोजी रोटी के अलावा किसी से मतलब नहीं है। मीडिया न हुआ गरीब की लुगाई हो गई जिसके साथ आप जब चाहे कुछ कर लो।
ऐसा नहीं है कि यह सब हाल के वर्षों में हुआ लेकिन चंद सालों में इसे धारदार तरीके से इस्तेमाल किया जाने लगा। दरअसल बगैर संवैधानिक अधिकार के मीडिया ने जिस तरह से राजनेताओं, अधिकारियों और अपराधियों के गठजोड़ पर प्रहार करना शुरु किया तब से ही इन तीनों के गठजोड़ ने अपनी ईज्जत बचाने मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रहार शुरु किया।
नेताओं, अफसरों और माफियाओं के गठजोड़़ ने जिस तरह से देश में लूट खसोट की परिपाटी शुरु की उस पर मीडिया ने ही बाधा डाली कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मीडिया के बढ़ते प्रभाव से लुट खसोट में बाधाओं को बर्दाश्त करना इन गठजोड़ के लिए कठिन काम था इसलिए साजिशन मीडिया की विश्वसनियता पर न केवल सवाल उठाये गये बल्कि पत्रकारों की हत्या तक की जाने लगी है। 
अपनी छवि चमकाये रखने मीडिया की छवि को बिगाडऩे के लिए जिस तरह का षडय़ंत्र किया गया वह शोध का विषय है। ऐसे गठजोड़ ने सत्ता के दम पर सबसे पहले ऐसे मीडिया घराने को अपने जाल में फंसाया जो पैसों के दिवाने थे। उन्हें भय और प्रलोभन से ऐसी खबरों के लिए मजबूर किया गयाजो उनके हितों की रक्षा तो करे ही उनकी छवि को भी चमकाने का काम करे। इसके बाद आपराधिक कमाई से मिले धन से स्वयं का मीडिया हाउस खड़ा करने की कोशिश में ऐसे पत्रकारों को अपने जाल में फंसाया जिसके नाम का इस्तेमाल शार्पशूटर की तरह कर ले।
इन सबके बाद भी जब मीडिया को जब वे प्रभावित नहीं कर पाये तब फेंक न्यूज और ट्रोल आर्मी का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया। हालात को इस तरह से वे संचालित करने लगे कि आम आदमी की जरुरतों को नजरअंदाज किया जा सके और आम आदमी अपनी जरुरतों की बजाय उन मुद्दों में भटक जाए जिससे उनका ध्यान सरकार की तरफ से हट जाए और वे जाति, धर्म और देशभक्ति में उलझ कर रह जाए।
जन सरोकार के मुद्दे उठाने वालों को इतना ट्रोल किया जाए कि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया जाए। उसे धर्म विरोधी, देश विरोधी साबित कर दिया जाए। राजनीति, अपराधियों और अफसरों के इन गठजोड़़ की वजह से पत्रकारिता के इस नाजुक दौर में जिस तरह से खबरों की विश्वसनीयता संकट में है वह देश के हित में कतई नहीं है। मीडिया हाउस तो पहले ही बंटे थे और अब पत्रकार भी बंटे नजर आने लगे है।
और अत में...
पिछले दिनों मोटर साइकिल की दुनिया में जावा ने जब कदम रखा तो उसने पत्रकार वार्ता का आयोजन किया। पत्रकार वार्ता में भीड़ बढ़ गई और इस भीड़ से आयोजकों में उत्साह भी था तो बेचैनी भी। क्योंकि पत्रकारों को ऐसे अवसर पर दिया जाने वाले उपहार कम पड़ गये। कुछ ने इस तरह के आयोजन में चेहरा और बैनर देख उपहार बांटने पर नाराजगी भी दिखाई। पर यह नाराजगी केवल आयोजन स्थल तक सिमट कर रह गया। वहां की अव्यवस्था पर किसी भी अखबार ने कुछ नहीं लिखा।

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

ट्रोल आर्मी के निशाने पर पत्रकारिता



वैसे तो पत्रकारिता का स्वर्णीम काल कभी नहीं रहा। आलोचना हर किसी को बर्दाश्त नहीं होता वो तो मजबूरी है वरना वे आलोचना करने वालों को सरेआम पीट दे या मार तक डालें।
इन दिनों पत्रकारिता पर नये तरह के खतरे पैदा होने लगा है। नेता या अधिकारी आलोचना करने वाले पत्रकारों को सीधे पीटवाने की बजाय उन्हें देशद्रोही साबित कर भीड़ के हाथों पिटवा देने का षडय़ंत्र रचने लगे हैं।
एनडी टीवी के पत्रकार रविश कुमार की माने तो दो हजार चौदह में कोई अवतारी पुरुष आया जिसकी आलोचना नहीं हो सकती जिससे सवाल नहीं किये जा सकते और ऐसा करने वालों को देशद्रोही बता दो ताकि भीड़ उन्हें मार तक डाले।
पिछले दिनों भाजपा कार्यालय में एक पत्रकार के साथ पिटाई हुई और इस मारपीट में भाजपा के नेता फंस गये। लेकिन अब वे लोग ज्यादा सचेत हैं इसलिए वे अब खबरों पर ट्रोल करने लगे। पिछले दिनों भास्कर में छपी एक कार्टून को ट्रोल किया गया। और उस कार्टून को देश विरोधी बताते हुए अखबार को पढऩा बंद कर देने की अपील की गई। प्रवीण मैसेरी नामक इस भाजपा नेता के ट्रोल पर अन्य भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया होने लगी और यह पूरा ट्रोल आर्मी के शक्ल में तब्दिल हो गया। इनमें से कितने लोगों ने भास्कर की प्रति अपने घर में बंद की यह तो पता नहीं लेकिन कल तक भास्कर को अपना अखबार बताने वाले भाजपा नेता का इस अखबार को रातों रात देशद्रोही बता देना हैरानी भरा है।
अवतारी पुरुष का यह ट्रोल आर्मी किस तरह से पत्रकारिता पर हमला कर रहा है वह आने वाले दिनों में पत्रकारिता के लिए नये खतरे पैदा कर रहा है। भीड़ के हाथों कब कौन पत्रकार के पीटे जाने की खबरें आ जाए कहा नहीं जा सकता है।
स्वागत है दाऊजी
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सांईस कालेज में जब यह घोषणा की कि उनकी सरकार किसी का फोन टेपिंग नहीं करायेगी तो यह पत्रकारों के लिए खुशी का मौका था।
क्योंकि पिछली सरकार यानी रमन सिंह की सरकार ने जिस तरह से अपने विरोधियों का फोन टेप कराये थे उसकी वजह से कई पत्रकारों के लिए फोन पर बात करना असहज हो गया था। एक डर बना रहता था कि सरकार पता नहीं किस मामले में जन सुरक्षा कानून लगाकर जेल में डाल दें। कई नामचीन पत्रकारों के फोन ही नहीं टेप किये जा रहे थे बल्कि वे किससे मिलते जुलते हैं उन्हें खबर कहां से मिलती है इसका भी हिसाब किताब सरकार रख रही थी। एक अज्ञात भय में जीने को मजबूर थे ऐसे में जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने फोन टेप नहीं कराने की घोषणा की तो इसका चौतरफा स्वागत हुआ है। अपने राजनैतिक फायदे के लिए जिस तरह से रमन सरकार ने फोन टेप कराया वह किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक है और ऐसी कार्रवाई शर्मनाक कही जानी चाहिए।
मीटिंग की ऐसी की तैसी
राजधानी से प्रकाशित हो रहे कई नामचीन अखबारों में मीटिंग की प्रक्रिया से कई पत्रकार दुखी है खासकर सिटी रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों का गुस्सा आये दिन सार्वजनिक होने लगता है। दरअसल इस तरह की मीटिंग से समय श्रम व धन की बर्बादी के रुप में देखा जा रहा है तो कुछ गलत भी नहीं है। सब काम धाम छोड़कर 11-12 बजे कार्यालय में बुलाई जाने वाली इस तरह मीटिंग में ज्यादा कुछ होता तो है नहीं उल्टे परेशानी जरुर होती है। जबकि आज हाई टेक्नोलाजी का जमाना है और इस तरह मीटिंग में टेक्नालाजी का इस्तेमाल करना भी चाहिए ताकि पत्रकारों को इस पीड़ा से निजाद मिल सके।
और अंत में...
पन्द्रह साल तक सत्ता की मलाई खाने वाले कुछ पत्रकारों में भाजपा के प्रति वफादारी का यह आलम है कि वे एक तरफ भूपेश बघेल की तारीफ के कसीदे गढ़ रहे है और भाजपा कार्यालय में केन्द्र सरकार की वापसी का दावा करते हैं।

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

वैचारिक पत्रकारिता और दलाली


वैचारिक पत्रकारिता और दलाली
यह सच है कि वैचारिक पत्रकारिता करना बहुत कठिन है। किसी एक विचारधारा के समर्थन में खड़ा होना वह भी सीना ठोंक के आसान नहीं है। वह भी तब जब आप सत्ता के बाहर हो। छत्तीसगढ़ में वैचारिक पत्रकारिता की शुरुआत कब से हुई यह कहना कठिन है लेकिन इसकी शुरुआत युगधर्म से होने की बात कही जाती है। अपना पक्ष रखने दक्षिणपंथियों ने अखबार निकाला और फिर एक विचारधारा को लेकर संघर्ष करते रहे लेकिन यह स्वीकार्य तब भी नहीं था और न ही दैनिक स्वदेश के खुलने के बाद ही स्वीकार्य हो पाया। परिणाम स्वरुप इस एक विचारधारा के साथ खड़ा रहना मुश्किल कार्य रहा इस तरह की पत्रकारिता से न केवल अखबार को खड़ा रखना मुश्किल है बल्कि एक विचारधारा को लेकर चलने वाले पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। यही वजह है कि सत्ता के दौरान फलने-फूलने वाले ऐसे पत्रकार सत्ता जाते ही गड़बड़ा जाते है।
ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद देखा जा सकता है। भाजपा की सत्ता जाते ही कल तक स्वयं को भाजपाई विचारधारा का समर्थक बताने वाले ऐसे अधिकांश पत्रकारों में स्वयं को भाजपा विरोधी साबित करने की होड़ सी मच गई है। कुछ तो पत्रकारिता छोड़ दूसरा काम धाम में रुचि ले रहे हैं तो कुछ कांग्रेसियों के सामने स्वयं को कांग्रेसी साबित करने में लग गए हैं। इनमें वे पत्रकार भी शामिल है जिन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत गद्रे भवन (पुराने भाजपा कार्यालय) में पनाह लेते थे या रात गुजारते थे। एक पत्रकार तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपनी नजदीकी का हवाला देते नहीं थकते और कोई भी काम करा लेने का दावा करते घूम रहा है। हालांकि यह पहले भी रमन राज में पत्रकारिता से Óयादा कमीशनखोरी का काम भी करा रहा है।
इसी तरह का एक पत्रकार जो चुनाव से पहले किसी भी सूरत में कांग्रेस की सत्ता नहीं आने का दावा करता था वह चुनाव परिणाम आते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अपने कालेज के जमाने का साथी बताता घूम रहा है।
इसी तरह 5 हजार की तनख्वाह से रायपुर में पत्रकारिता शुरु करने वाले का ठाठ इन दिनों चर्चा में है।
भाजपा की बौखलाहट...
चुनाव में बुरी तरह बौखलाई भाजपा को अब पत्रकार कांग्रेसी नजर आने लगे। पिछले दिनों भाजपा प्रभारी अनिल जैन को एक पत्रकार का सवाल इतना नागवार गुजरा कि वे प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ही एक पत्रकार को कांग्रेसी बता गये जबकि एक अन्य घटनाक्रम में भाजपा कार्यालय में एक पत्रकार की न केवल पिटाई की गई बल्कि एक महिला पत्रकार को अभद्रतापूर्वक कक्ष से बाहर निकाला गया। इस पत्रकार की सिर्फ इतनी गलती थी कि हार की समीक्षा के दौरान हंगामा कर रहे कार्यकर्ताओं की वीडियो बनाने वह बैठ गया था।
भाजपा नेताओं के शह पर हुई इस गुण्डागर्दी के खिलाफ प्रदेशभर के पत्रकार आंदोलन पर है लेकिन भाजपा नेतृत्व को इससे कोई लेना देना नहीं है। जबकि प्रेस क्लब रायपुर ने अनिश्चितकालीन धरना दे दिया है।
फर्जी के चक्कर में असली भी गये...
रमन राज में पत्रकारिता की आड़ में कई भाजपाई धंधा करने लग गये थे और फर्जी न्यूज एजेंसी बनाकर सरकार से लाखों रुपये महिना वसूल भी रहे थे। ऐसा नहीं है कि रमन राज के इस करतूत की जानकारी किसी को नहीं थी लेकिन सत्ता बदलते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जैसे ही इस करतूत की जानकारी मिली उन्होंने तुरन्त ऐसे 17 एजेंसियों का दाना पानी बंद कर दिया। कहा जाता है कि इन एजेंसियों की आड़ में कई भाजपाई लाल हो गये थे।
और अंत में...
जब से सत्ता बदली है जनसंपर्क विभाग में भी अमूल चूल परिवर्तन दिखने लगा है। एक अधिकारी के लम्बी छुट्टी पर चले जाने को लेकर चर्चा गर्म है।

गुरुवार, 12 मई 2016

स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...


स्वास्थ्य मंत्री की मीडिया को सलाह...
यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना प्रदेश के स्वास्थ मंत्री अजय चंद्राकर मीडिया को सलाह देने की बजाय स्वयं के आचरण और करतूत को सुधारने में ध्यान लगाते।
दरअसल स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर इन दिनों अपनी करतूतों को लेकर मीडिया की सुर्खियों में हैं। प्रदेश सरकार के महत्वकांक्षी योजना ग्राम सुराज में हिस्सा ले रहे अजय चंद्राकर के रवैये को लेकर जिस तरह से बातें सामने आ रही है वह हैरान कर देने वाली है।धमकी-चमकी गाली गलौज के लिए पहले ही चर्चित अजय चंद्राकर के ग्राम सुराज में बोल इन दिनों चर्चा में है और अपने आचरण को ठीक करने की बजाय वे मीडिया को सलाह दे रहे हैं कि वे उन्हें निशाना बनाने की बजाय ग्राम सुराज जैसे अच्छे कार्य पर लिखे।
दरअसल पिछले दशक भर से चल रहे ग्राम सुराज को लेकर सरकार की पहले ही किरकिरी हो रही है ऐसे में अजय चंद्राकर के आचरण की चर्चा स्वाभाविक है। ऐसा नहीं है कि अधिकारियों की करतूतों की वजह से अजय चंद्राकर का गुस्सा फुट रहा है असल में अजय चंद्राकर अपनी इस तरह की हरकतों को लेकर पहले ही चर्चा में रहे हैं। महिलाओं से दुव्र्यवहार के अलावा दूसरे कई मामले पहले भी उठते रहे हैं। जानकारों का तो यहां तक दावा है कि अपनी इसी हरकत की वजह से ही वे पिछली बार चुनाव में पराजित हुए थे।
वैसे मीडिया को लेकर जिस तरह की सोच बनते जा रही है उसे लेकर मीडिया को भी सचेत रहने की जरूरत है। बस्तर के पत्रकारों पर जिस तरह से नक्सली और पुलिस का दबाव है लगभग खबरें न छापने को लेकर राजधानी के पत्रकारों पर मैनेजमेंट का दबाव कम नहीं है। किस मंत्री से किस अखबार मालिक का संबंधहै किसी से छिपा नहीं है। राजधानी में विज्ञापनों का दबाव के चलते खबरों का रुकना आम बात होने लगी है और इस वजह से सोशल मीडिया में भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का न केवल मजाक उड़ाया जाने लगा है बल्कि मीडिया की छवि को नुकसान पहुंचा है।
हालांकि यह बात बहुत कम लोग जानते है कि यह सारा खेल अखबार मालिक और सरकार के बीच का खेल है जिसमें पत्रकारों का कोई खास लेना देना नहीं होता। परन्तु जिस तरह से मीडिया को गरियाने या समझाने की परम्परा शुरु हुई है इसका क्या असर होगा यह भविष्य के गर्भ में है।
और अंत में...
मीडिया से खासे नाराज रहने वाले सत्ता पक्ष के एक नेता का कहना है कि दरअसल राजधानी के मीडिया घरानों का कांग्रेसियों से संबंध प्रगाढञ रहे हैं और वे यदि पावर में आये तो कईयों की दुकानदारी बंद करा देंगे और इस अभियान के तहत वे इन दिनों विकास प्राधिकरण में कमीशनखोरी का धन जमा करने में मशगूल है।

मंगलवार, 15 मार्च 2016

लिखने की दो... आजादी!


जेएनयू में कन्हैया कुमार जब लाल सलाम का मतलब समझा रहा था तब दिल्ली से दूर बैठे छत्तीसगढ़ में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहां सिर्फ लाल सलाम कहने वाले जेल में क्यों और कैसे ठूंस दिये जाते है। दिल्ली में लाल सलाम पर कानून का नजरिया अलग और छत्तीसगढ़ में अलग क्यों है। क्या इस देश में दो तरह के कानून है।
सवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य को लेकर भी उठ रहे है कि कल तक भारत में पैदा होने में शर्म महसूस होता था। कोई और ऐसा कह दे तो चड्डी वाले उसका जुलूस ही नहीं निकालते पुलिस भी मार कूट कर उसे सलाखों के पीछे डाल देती।
सवाल अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरे का बना हुआ है। सरकार किसी की भी हो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे सामान रुप से बना हुआ है। पत्रकारिता से इन बातों का सीधा संबंध हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली से दूर गांव तक आते-आते पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जाता है।
राजधानी में यह खतरे दूसरी तरह का है। यहां पत्रकारों को कोई सीधा पकड़कर जेल में नहीं डालता परन्तु उसकी नौकरी छुड़ा दी जाती है। इस खेल में पुलिस का नहीं जनसंपर्क विभाग का सहारा लिया जाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण है जब सिर्फ एक खबर पर कितनों की नौकरी चली गई कितनों के तबादले कर दिये गये। एक अखबार सारा संसार की बात हो या पत्र नहीं मित्र की बात हो राजस्थान से आये धुरंधर की बात हो या मंझोले कद की बात हो। खबरों की सच्चाई पर कम जनसंपर्क के दबाव में लिखने की आजादी पर बंदिशें लगाई गई।
कन्हैया के लाल सलाम का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है कि बस्तर में पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी है। नक्सली की आड़ में भ्रष्टाचार खूब फल फूल रहा है। सड़क-भवन के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है। नक्सलियों का डर बताकर सरकारी सेवक कार्यालयों से गायब हो जाते हैं। महिनों स्कूल नहीं लगता पर वेतन बराबर बंटता है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन का बुरा हाल है। पीडब्ल्यूडी के भवन व सड़क निर्माण का कोई हिसाब नहीं है। मनरेगा से लेकर दूसरी सरकारी योजनाएं दम तोड़ रही है और इस पर लिखने वालों को सीधे धमकी ही नहीं दी जाती जेल तक में ठूंस दिया जाता है। आरोप भी नक्सलियों से सांठ-गांठ का होता है। 
दिल्ली में जिस मस्ती से कन्हैया ने लाल सलाम कह दिया वैसा बस्तर में कोई कह नहीं सकता। जन सुरक्षा कानून मजबूती से पैर जमाये हुए है। बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल को भेजे जाने वाले मैसेज क्या यह चुगली करने के लिए काफी   नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है। परन्तु सरकार को यह सब नहीं दिखता। पर्याप्त सबूत के बाद भी सरकार की खामोशी क्या यह साबित नहीं करते कि बस्तर में पत्रकारों के साथ जो कुछ हो रहा है वह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है?
यह सच है कि इन दिनों देश भर में पत्रकारों को गरियाने का दौर चल रहा है। परन्तु इसके लिए जिम्मेदार क्या सरकार-प्रशासन और वे मीडिया हाउस नहीं है जो दबाव में है। जो अपने हितों के लिए पत्रकारों को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें खबरों पर स्वयं के हित में खतरे दिखते हैं पीछे हट जाते हैं।
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गुरुवार, 3 मार्च 2016

एक बहस पत्रकारिता पर...


अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

शादी समारोह और पत्रकार


छत्तीसगढ़ पिछले हफ्ते वी आई पी शादियों के लिए चर्चा में रहा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा और प्रदेश सरकार के मंत्री द्धय बृजमोहन अग्रवाल ओर अमर अग्रवाल के यहां शादियां थी। इस शादी में बंटे निमंत्रण पत्र ओर इसमें आने वाले मेहमानों की चर्चा रही लेकिन इस समारोह में शामिल होने वाले पत्रकारों की चर्चा भी मीडिया जगत में होने लगी है।
तीनों ही शादियों के निमंत्रण पत्र पत्रकारों के रूतबे के हिसाब से बांटा गया। बैनर को प्राथमिकता तो दी ही गई। विवाह समारोह में शामिल होने गाडिय़ों के भी प्रबंध किये गये। शादी समारोह में शामिल होने वाले फोटोग्राफरों ने तस्वीरें भी खूब ली लेकिन उस तरह से नहीं छपा। सबसे बड़ी शदी का तमगा बृजमोहन अग्रवाल ले गये। अन्य समारोह से ज्यादा वीआईपी और भीड़ भी मोहन भैया ने ही खीची लेकिन पत्रकारों को आने वाले वीआई पी अतिथि से बातचीत करने का मौका नहीं मिला। कुछ पत्रकार इस कोशिश में लगे भी रहे लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। हां वीआईपी लोगों के खुशामत करते स्थानीय नेताओं की तस्वीरें भी कैद करने में फोटो ग्रफर सफल हो गये लेकिन किसी की यह सब छप नहीं पाया।
नवभारत में फिर 
तनाव शुरू...
नवभारत में रंगा-बिल्ला की जोड़ी अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रहे हैं जिसके चलते एक बार फिर कर्मचारियों में आक्रोश पनपने लगा है और वे इस बार आर पार की लड़ाई करने के मूड में है तो क्रानिकल वाले इसका इंतजार कर रहे हैं।
वेतन को लेकर 
माथापच्ची...
पत्र नहीं मित्र बताने वाले एक अखबार में वेतन को लेकर फिर संकट शुरू हो गया है। यहां के कर्मचारी टाईम पर वेतन नहीं मिलने का रोना तो रो रहे हैं लेकिन सामने आकर कुछ करने की हिम्मत नहीं है। फिर मालिकों के दलालों की भी कमी नहीं हैं इसलिए अपनी व्यथा दबी जुबान पर कर रहे हैं।
पिकनिक और मजा 
हर साल की तरह इस बार भी प्रेस क्लब परिवार 26 जनवरी को मनोंरजन भ्रमण पर निकले थे। रतनपुर महामाया के दर्शन से अभिभूत पत्रकार जब कानन पेंडारी पहुंचे तो सोमवार होने की वजह से ताला लगा था। वहीं कुछ देर बिताने के बाद कई नाराज लोग होटल पहुंचे तो रात के खाने की व्यवस्था से कानन पेड़ारी नहीं घूम पाने का दर्द भूल गये। हर बार की तरह इस बार भी पत्रकार परिवारों ने खूब मजा किया।
दबंग की दंबगई 
राजधानी से प्रकाशित होने वाले एक अखबार ने एक ही बार में कई पत्रकारों को चलता कर दिया। अचानक नौकरी जाने की मुसिबत से पत्रकार दुखी हैं और वे इसकी शिकायत भी कर रहे है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है।
पहल एक नई सोच
 पत्रिका का विमोचन
रायपुर। डी.एड. प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा के दूरस्थ प्रशिक्षण डी.एड.के प्रशिक्षार्थियोँ द्वारा पहल एक नई सोच नामक पत्रिका का विमोचन प्रशिक्षण केन्द्र शा.उच्च. मा. वि. पिथौरा मेँ किया गया। जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार पटनायक, विशिष्ट अतिथि पी.एस. श्याम प्राचार्य डाइट महासमुन्द, एम.डी. प्रधान सेवानिवचत प्राचार्य, एम.के. दास प्राचार्य प्रशिक्षण केन्द्र पिथौरा ने सभा को संबोधित किया। केन्द्र समन्वयक शंकर गोयल ने इसे एक अभिनव पहल बताया वहीं संपादक इंदीवर वैष्णव ने पत्रिका पर प्रकाश डाला। सहसंपादक सुन्दर लाल डडसेना ने पत्रिका को एक नई सोच को संज्ञा के अनुरुप बताया तथा नीरज दास ने आभार प्रकट किया। पत्रिका को प्रकाशित करने मेँ सभी प्रशिक्षार्थियों का प्रत्यक्ष एवं परोख सहयोग रहा।
और अंत में...
प्रेस क्लब का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहा है कई पदाधिकारियों की धड़कने तेज होने लगी है। व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं होने से कई नारा जो हैं। 

सोमवार, 24 मार्च 2014

मीडिया को गरियाने का मतलब...


इन दिनों कार्पोरेट मीडिया घराना आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल और उसकी टीम के निशाने पर है। लोकपाल बिल को लेकर राजनीति में आने वाले अरविन्द केजरीवाल का यह हमला कितना कारगर और सही है यह विवाद का विषय है। विवाद का विषय तो कार्पोरेट मीडिया घराना के कारनामों भी है। कार्पोरेट मीडिया घराना की विश्वसनियता पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। खासकर चुनावों में पेड न्यूज को लेकर इन पर हमला पहले भी होता रहा है। सुखद स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ में यह स्थिति पूरी तरह हावी नहीं है। खबरों को लेकर आम लोगों की नाराजगी जरूर है। बड़े लोगों के खिलाफ खबरे ठीक से प्रकाशित नहीं करने का आरोप भी लगता रहा है लेकिन पत्रकारिता के मल्यों को लेकर सवाल कम ही है। छत्तीसगढ़ में अखबार की आड़ में जमीन लेने और सरकारी सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर सवाल तो उठते हैं लेकिन इससे परे जाकर पत्रकारिता के मूल्यों की चिंता करने वालों की भी कमी नहीं है। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर आज भी प्रिंट मीडिया हावी है और इलेक्ट्रानिक मीडिया भी उस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि कोसा जा सके। नवभारत की विश्वसनियता आज भी कायम है तो भास्कर के मार्केटिंग का कोई जवाब नहीं है पत्रिका का तेवर बरकरार है तो दूसरे अखबार भी खबरों को लेकर चर्चा में बने रहने को जुगत में लगे हैं। यह अलग बात है कि आज भी भंडाफोड़ खबरों के लिए छोटे अखबार ही माहिर है। संपादकीय टीम पर भले ही विज्ञापन या मार्केटिंग वाले हावी हो लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों पर समझौते की स्थिति कम ही है। यह अलग बात है कि अखबारों के द्वारा सरकारी जमीन लेने और अधिमान्यता लेने  में अखबार मालिकों में होड़ मची है लेकिन यहां के ज्यादातार पत्रकारों को अब भी सरकारी सुविधा लेने में परहेज है। अरविन्द केजरीवाल के मीडिया पर लगाये आरोप को लेकर छत्तीसगढ़ में भी हलचल कम नहीं है। और इस पर दोनों तरह की राय स्पष्ट दिखने लगी है। एक वर्ग इसे अखबार को धंधा बनाने वालों पर हमला के रूप में देखता है तो दूसरा वर्ग इससे पत्रकारिता के और मजबूत होने की उम्मीद के रूप में देखता है। ऐसा नहीं है कि मीडिया पर आरोप पहली बार लगा है पहले भी इस तरह के सवाल उठते रहे हैं।
प्रेस क्लब में होली
प्रेस क्लब में होली का कार्यक्रम इस बार अलग ही ढंग का रहा। होलिका दहन के दिन आयोजित होने वाले कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया लेकिन दूसरे दिन यानी रंग खेलने सभी पहुंचे। कुछ लोग दस साल बोतल नहीं मिल पाने का टोना रो रहे थे लेकिन यह कसर भी दूर हो गई ज्यादातर वही लोग आये जो रोज आते हैं।
नानसेंस टाईम्स की खाना पूर्ति
हर साल अपना जलवा दिखाने वाला नानलेंस टाईम्स इस बार खाना पूर्ति करता नजर आया। तपेश जैन, मधुसूदन शर्मा की यह शुरूआत इस बार फीका रहा। खबरों से ज्यादा विज्ञापन हावी रहा तो कई लोग जान बुझकर छोड़ दिये गये।
और अंत में...
प्रेस क्लब के चुनाव में इस बार एक अखबार मालिक की रूचि को लेकर चर्चा गर्म है इस बार प्रेस क्लब में वे अपने रिपोर्टरो को प्रमुख पदों पर बिठाने लालायित है और इसकी रणनीति तैयार की जाती है। पहली बैठक हो चुकी है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

पद की बढ़ती लालसा...


ऐसा नहीं है कि  राजनीति में ही पद के लिए सब कुछ होता है। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में भी पद के लिए कुछ भी करेगा वालों की कमी नहीं है।
छत्तीसगढ़ में पत्रकार के संगठनों की कमी नहीं है और कई लोग तो इसे दुकानदारी तक बना चुके है लेकिन रायपुर प्रेस क्लब अब भी सबसे प्रतिष्ठित है। लेकिन हाल के सालों में इस पर भी पद लोभ का जो रंग चढ़ा है वह आश्चर्यकर देने वाला है। कभी हाथ उठाकर पदाधिकारी बनाने वाला यह क्लब चुनाव के झंझटो में पड़ गया है तो इसकी वजह पद की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना नहीं तो और क्या है।
पिछले डेढ़ दो दशकों से तो ज्यादातर यह हुआ है कि जिसने भी पद पाई वह चुनाव को टालने की कोशिश में रह गया। और नियत समय में चुनाव नहीं कराने की वजह से हंगामा की स्थिति बनी। इसकी एक प्रमुख वजह वरिष्ठ पत्रकारों की प्रेस क्लब से दूरी बना लेना भी है। तो कुछ लोगों की गुटबाजी भी है।
इस बार भी नियत समय में चुनाव नहीं होने पर जब सदस्यों ने दबाव बनाया तो चुनाव की तिथि घोषित कर दी गई।
प्रेस क्लब का चुनाव 30 मार्च को है और अगला चुनाव सही समय पर हो इसे लेकर भी चिंता है। सबसे बड़ी चिंता उन्हें है जो हर हाल में पद चाहते हैं इसके लिए घेरेबंदी भी शुरू हो गई है।
हालांकि कई लोगों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन कहा जा रहा है कि पहले पदों पर रहे लोग इस बार फिर से सक्रिय हो गये हैं। इनकी सक्रियता की वजह पुन: पद पर आना है।
हालांकि पिछला अनुभव स्पष्ट हैं कि जिसने भी दोबारा पद पाया है उसने नियम समय में चुनाव नहीं कराया है इसके बाद भी अच्छे पत्रकारों की प्रेस क्लब से दूरी की वजह से वह सब होने लगा है जो नहीं होना चाहिए।
राजधानी बनने के बाद बढ़ी प्रतिस्पर्धा से कई पत्रकारों को किसी तरह नौकरी बचा लेने की चिंता है तो कोई विवाद से दूर रहना चाहता है यही वजह है कि ऐसे लोग सक्रिय हो जाते हैं। जो पत्रकारिता की बजाय पद से अपनी छवि बनाना चाहते है।
प्रेस क्लब में मोटे तौर पर 40-50 पत्रकार ही नियमित रूप से आते हैं इनमें से ज्यादातर प्रेस कांफ्रेंस के दिनों में ही दिखते है बाकी फोटोग्राफरों का समूह होता है जिन्हें अपने काम से मतलब होता है। एक समूह सिर्फ समय काटने पहुंचता है तो कुछ यहा कदा खबरों के फेर में आते हैं। ऐसे में करीब चार सौ सदस्यों वाले एस प्रेस क्लब की चिंता को लेकर कुछ लोग ही दुबले हो रहे है। तो इसकी परवाह भला कौन करे।
वरिष्ठ व सम्मानित पत्रकारों की आवाजाही नहीं के बराबर है वे आते भी है तो तभी जब कोई आयोजन हो। ऐसे में स्वेच्छाचारिता तो बढ़ी ही है पठन-पाठन में भी रूझान कम हुआ है। आजकल तो खबरों पर कम दूसरी बातों पर ही चर्चा अधिक होती है।
और अंत में...
प्रेस क्लब की सदस्यता को लेकर विवाद गहराता रहा है। काफी अरसे से नये सदस्य नहीं बनाये जा रहे हैं और इस बार भी चुनाव पुराने सदस्यों के हिसाब से ही होना है ऐसे में नये सदस्यों का क्या होगा। अब तक तो वे बेरोक टोक प्रेस क्लब आ ही रहे हैं।

सोमवार, 3 मार्च 2014

ये तो होना ही था...

प्रेस क्लब में अंतत: चुनाव की तिथि घोषित हो ही गई। 30 मार्च को होने वाले चुनाव के लिए सदस्य 8 माह से लगे हुए थे लेकिन पदाधिकारियों को बहाने बाजी के चलते चुनाव टलता ही जा रहा था इधर पदाधिकारियों से नाराज सदस्यों ने दबाव बनाया तो एक-एक कर पदाधिकारी इस्तीफा देने लगे और जब सदस्यों ने 2 मार्च को आामसभा बुलाने का आग्रह नोटिस बोर्ड में चिपका दिया तो फिर पदाधिकारियों को मजबूरन बैठक बुलानी पड़ी। बैठक में हंगामे के पूरे असार थे लेकिन जब बैठक शुरु हुई तो कॉकस ने मोर्चा संभाल लिया। पिछली बार भी यही हुआ था अनिल पुसदकर के पांच साल के कार्यकाल को  माफी दे दी गई और इस बार भी वहीं हुआ और तय हुआ कि एक समिति बना दी जाए जो 30 मार्च को चुनाव करा देगी। सदस्यों का गुस्सा हटा या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन सारा कुछ पूर्ण निर्धारित तरीके से सम्पन्न हो गया। अब देखना है कि 30 की सामान्य सभा में क्या होता है।
बड़े से टकराओंगे
चूर-चूर हो जाओगे।

पूरे देश को अपना बंधु मानने वाले अखबर के पत्रकार को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि बटाविया जैसे दिग्गज धंधेबाज से टकराना इस कदर भारी पड़ेगा कि उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। आखिर बटाविया छोटा मोटा खिलाड़ी तो है नहीं उसकी गिनती नौ रत्नों में होती है।
अब यह पत्रकार जगह-जगह अपनी पीड़ा बताते घुम रहा है। प्रेस क्लब ने भी इसे पत्रकार के घर जबरिया पुलिस घुसने की निंदा जाहिर की थी। पदाधिकारियों को भी खामोश रहने का संकेत दिया गया। ऐसा पहले भी हो चुका है आजकल विज्ञापन के दबाव में अखबार मालिक पत्रकारिता के मूल्यों को ताक पर रखते हैं। इससे पहले जनसंपर्क के खिलाफ खबर छापने पर एक पत्रकार की नौकरी जा चुकी है।
जितना बड़ा बैनर
उतना बड़ा पैकेज

लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। राजनैतिक दल अपने हर गतिविधियों का प्रमोशन चाहते है और इसके लिए नामचीन अखबारों के पत्रकारों को खबर के साथ बहुत कुछ देने लगे हैं। खबर है कि पिछले दिनों ऐसे ही लेन देन को लेकर संझट हो गया उसे ज्यादा मुझे कम को लेकर मुंह  फुलने फुलाने का कवायद चल रही है। ऐसा ही नजारा विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था जब एक बड़े बैनर को पता चला था कि उसे कम पैकेज दिया गया। खबरें उल्टी लगने लगी और फिर बाद में मामला सेट किया है।
छोटे बैनर वाले तब भी हताश व निराश थे लेकिन इस बार कुछ छोटे बैनर वाले बैठक कर चुके हैं कि किस तरह से दबाव बनाया जाए। शहर के मध्य स्थित एक होटल में रात के डिनर के साथ हुई बैठक तो जोरदार रही लेकिन दबाव कितना जोरदार होगा कहना कठिन है।
और अंत में...
30 मार्च को होने वाले प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर इस बार जबरदस्त मोर्चेबंदी होने लगी है। कुछ पुराने पदाधिकारी भी चुनाव लडऩा चाहते है लेकिन पिछले दो कार्यकाल को लेकर जो बदनामी हुई है उसकी वजह से हार का डर साफ दिखने लगा है। कई तो अभी से कहने लगे है कि मुझे दुबारा नहीं लडऩा तो कुछ कह रहे हंैं इस बार नहीं लडऩा।


बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

पत्रकारों का पेंशन और प्रेस क्लब


पत्रकारों की मांग पर सरकार ने पेंशन देने की घोषणा की तो सभी पत्रकार खुश थे उन्हें लगने लगा था कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा लेकिन योजना की शर्तों से उनकी खुशी काफूर होने लगी है। योजना कहां से और कैसे बनी इनके नियम शर्ते कहां से आये इस पर सवाल उठने लगे है। जितनी मुंह उतनी बातें होने लगी है। पत्रकारों में इस बात की चर्चा खूब है कि सरकार ने पेंशन योजना की शर्तों में जनसंपर्क के कुछ अधिकारी और अखबार मालिकों की सलाह मान ली जिसकी वजह से कुछ ऐसी शर्ते जोड़ी गई ताकि कम से कम पत्रकारों को इस योजना का लाभ मिले। मजिठिया आयोग की सिफारिश लागू करने में आनाकानी करने वाले अखबार मालिकों की बात छोड़ भी दें तो ऐसे अखबार मालिकों की कमी नहीं है जो अपने अखबार में काम करने वाले पत्रकार को अपना कर्मचारी नहीं मानते ऐसे में पेंशन योजना की नियुक्ति पत्र की शर्ते कैसे पूरी हो पायेगी।
हालांकि पत्रकारों ने भी रास्ता अख्तियार कर लिया है और संपादक से लिखवाने लगे है कि पूर्णकालिन कर्मचारी न ही कम से कम यह तो लिख दें कि कुछ महीने या साल से काम कर रहे हैं। इसके बाद भी आवेदनों में कमी बेहद कमी है।
प्रेस क्लब का विवाद...
जब से छत्तीसगढ़ राज्य बना है प्रेस क्लब के पदों पर बैठने की होड़ मची हुई है। रायपुर प्रेस क्लब का अपना रूतबा है और इसी रूतबे को भुनाने में कुछ पत्रकार लगे हैं। हालांकि यह कोई गलत भी नहीं है लेकिन गलत तब होता है जब पदाधिकारियों की लालच बढ़ जाती है। पद का मोह अच्छे अच्छों का ईमान डिगा देता है। इससे पहले अनिल पुसदकर और गोकुल सोनी को तो पद का इतना मोह था कि वे पांच साल जंमे रहे। सदस्यों को मुहिम चलानी पड़ी। समिति गठन करना पड़ा तब कहीं बड़ी मुश्किल से चुनाव हुए। चुनाव में बृजेश चौबे अध्यक्ष बने तो उनका भी पद का मोह जाग गया। अन्य पदाधिकारी भी चुनाव ही नहीं कराना चाहते। महासचिव विनय शर्मा हो या उपाध्यक्ष के के शर्मा, सभी अपने को पदों पर चिपकाये हुए हैं। कार्यकाल समाप्त हुए साल बित गये पर कुर्सी से चिपकने का मोह नहीं छुट रहा है।
सुशांत राजपूत कोषाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले पहले पदाधिकारी थे फिर एक-एक कर अध्यक्ष को छोड़ सब इस्तीफा देने का दावा कर रहे हैं लेकिन जैसे ही कोई कार्यक्रम होता है सभी इकट्ठे नजर आते हैं।
इस कार्यकाल में कर्मचारियों से विवाद के लिए पदाधिकारियों की पहचान बन गई है। प्रेस क्लब के कर्मचारियों से झगड़ा करते पदाधिकारियों की करतूतों पर सभी हतप्रभ हैं।
सोमा पहुंची हरिभूमि
बेहतर वेतन और बड़े बैनर का मोह भला किसे नहीं है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता दिखाने वाली सोमा शर्मा अब हरिभूमि पहुंच गई है। जबकि लोकसभा चुनाव के पहले और भी आवाशाही की चर्चा है।
और अंत में...

वरिष्ठ पत्रकार मधुकर खेर की जयंति पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अध्यक्ष को छोड़ प्रेस क्लब के पदाधिकारी गायब थे तो अनिल पुसदकर भी नजर आये। पत्रकारों की टिप्पणी थी कि वक्त पर चुनाव हो जाये बस यही खेर साहब के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

जो दिखता है वह बिकता है...



छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की अपनी पहचान है, ग्रामीण रिपोटिंग से लेकर छोटी-छोटी खबरों पर यहां के पत्रकारों की पैनी नजर के सभी कायल हैं। लेकिन व्यवसायिकता का रंग भी चढऩे लगा है। बढ़ती महंगाई के बाद भी न तो नये-नये पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन होना ही रूक रहा है और न ही खबरों के तेवर में ही कोई कमी आई है। कमी आई है तो विश्वासनियता पर और इसकी वजह प्रिंट से ज्यादा इलेक्ट्रानिक मीडिया को दोषी माना जा रहा है। जो दिखता है वहीं बिकता है के फामूर्ले पर चल रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया के इस युग में भी प्रिंट का जलवा बरकरार है तो इसकी वजह प्रकाशित होने वाली खबरों की विश्वसनियता से ज्यादा पत्रकारों की मेहनत है। वरना कुछ अखबार तो मार्केटिंग के चक्कर में विज्ञापन वाले अखबार भी कहलातें है और उन्हें इस पर कोई रंज भी नहीं है।
पत्रकारों की साहसिक यात्रा...
कांकेर के पत्रकार कमल शुक्ला अपने तेवर के लिए पहचाने जाते हैं। पिछले दिनों नक्सलियों द्वारा पत्रकार नेमीचंद जैन और रेड्डी की हत्या कर दी गई इससे पत्रकार बिरादरी उछेलित है और नक्सलियों के इस घटना के विरोध में पत्रकारों ने पदयात्रा की। धुर नक्सली इलाके में इस पद यात्रा के अपने मायने है और इसका दूरगामी परिणाम भी निकलने की उम्मीद है। इस पद यात्रा में रायपुर से गिरिश पंकज भी शामिल हुए जबकि बस्तर ही नहीं छत्तीसगढ़ भर के तमाम पत्रकारों ने इसे समर्थन देते हुए कई ने तो पदयात्रा भी की।
इधर उधर जाना जारी है...
राजधानी के कई पत्रकारों के साथ यह स्थिति हमेशा बनी रहती है कि आज वे कहां है कल कहां होंगे। इसी कड़ी में जहां से भी अच्छा ऑफर आये वो इधर-उधर जाने से परहेज नहीं करते। पिछले दिनों रामकुमार परमार ने अमृतसंदेश को थाम लिया तो विकास शर्मा भी विजन को अलविदा कर दिया। वैसे चर्चा यह भी है कि अभी कई और पत्रकार इधर-उधर जाने की जुगत में लगे हैं।
जबकि कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े पत्रकार भी प्रिंट मीडिया में जमीन तलाश रहे हैं।
और अंत में...
प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर बढ़ते असंतोष से पदाधिकारियों के इस्तीफे की कथित नौटंकी जारी है और कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव तक पदों पर बैठे रहने की मंशा भी वे यदा कदा जाहिर करते है। पदों पर बैठे रहने वालें कार्रवाई की डर से इस्तीफे की बात कर रहे हैं पर कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए बेशर्मी से कहते है कि प्रेस क्लब की इज्जत का सवाल है। पर इस बार सदस्य निलंबन का प्रस्ताव तो रख ही सकते हैं।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

भ्रष्टाचार का स्वागत सत्कार...


कहने को तो जनसंपर्क विभाग का काम सरकार और जनता के बीच सेतु का है लेकिन छत्तीसगढ़ में जनसंपर्क विभाग का काम न केवल सरकार की चापलूसी करना रह गया है बल्कि यहां बैठे अपसरों का काम मीडिया को धमकाने का हो कर रह गया है। भ्रष्टाचार से सराबोर इस विभाग के किस्से भले ही खबर नहीं बन पाते हो पर सच तो यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के इस विभाग ने भ्रष्टाचार में अनूठा रिकार्ड बना चुका है।
संवाद भवन के किराये को लेकर चर्चा में आया यह विभाग अवैधानिक नियुक्ति को लेकर भी चर्चा में है। यही नहीं इन दिनों मोटर सायकल को टैक्सी बताकर लाखों भुगतान करने की वजह से यह विभाग सुर्खियों में है। जीरो भ्रष्टाचार की दुहई देने वाले डॉ. रमन सिंह के हम जनसंपर्क विभाग में भ्रष्टाचार के इस नंगा नाच पर भले ही लीपापोती की जा रही हो पर वास्तविकता यह है कि इसकी जड़े इतनी गहरी है कि इसे पार पाना आसान नहीं है। पत्रकारों से स्वागत-सत्कार के फंड के नाम पर जिस तरह से यहां बैठे अधिकारी अपना पेट भर रहे है उसे लेकर पत्रकार भले ही नाखुश हो लेकिन इसे खबर बनाने की हिमाकत इसलिए भी बड़े बैनर नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें इस विभाग से विज्ञापन के रूप में मोटी रकम मिलती है। आखिर रिपोर्ट के बाद भी यदि बड़े अखबार खबर न छापे तो इसे क्या कहा जाए। अखबारों के इसी रवैये को लेकर आम लोगों में पत्रकारों की छवि धुमिल हुई है और ऐसी खबरें नहीं छपने पर भले ही वे अपने मालिकों को लाख कोसे लेकिन सुनना तो उन्हें ही पड़ता है।
बड़े बैनर के जलवे
बड़े बैनर के पत्रकारों के अपने जलवे है। पैसा भले ही न मिले पर मान सम्मान में कमी नहीं होती। खासकर अधिकारी और नेता तो ऐसे ही बड़े बैनरों के पत्रकारों के साथ बैठने में स्वयं कौ गौरवान्वित महसूस करते है। कहीं कोई कार्यक्रम हो या पत्रकार वार्ता आयोजको की निगाहें भी ऐसे ही पत्रकारों को ढूंढते रहती है। यही वजह है कि बड़े  बैनर वाले पत्रकार भी इसका एहसास कराने से नहीं चुकते।
पिछले दिनों मीडिया सीटी के कार्यक्रम में भी इसे महसूस किया गया। यहां बन चुके सभी मकान बड़े बैनर के पत्रकारों के है छोटे बैनर वाले तो कई पत्रकार अभी तक रजिस्ट्री तक नहीं करा पाये हैं।
नहले पे दहला
मीडिया सिटी के कायक्रम में मुख्यअतिथि बने डॉक्टर साहब को कई पत्रकार अपनी तरफ आकर्षित करते नजर आये। पत्रकारों ने मीडिया सिटी फेम टू के लिए लगे हाथ जमीन तक मांग ली। अपनी तारीफ से अभिभूत मुख्यमंत्री ने भी नहले पर दहला मारने में कसर नहीं छोड़ी। सभी मकान बनने के बाद जमीन देने की बात कह कर उन्होंने भले ही मांग मान ली पर वे जानते है कि सभी पत्रकारों के लिए मकान बना पाना आसान नहीं है। वहीं उन्होंने यह कटाक्ष करने से भी परहेज नहीं किया कि जमीन देने के बाद लोकार्पण के लिए उन्हें न केवल सात साल इंताजार करवाया गया वह भी दो चुनाव जीतने पड़े यानी चुनाव नहीं जीतते तो...!
और अंत में...
तमाम कोशिश के बाद भी प्रेस क्लब का चुनाव नहीं होने की वजह को लेकर चर्चा पदाधिकारियों के द्वारा वसूली किये जाने तक आ पहुंची है। अनिल पुसदकर को कोसने वाले अब खुद बैठे है ऐसे में यह चर्चा स्वाभाविक है कि कमाई की वजह से ही चुनाव नहीं् होते और इस्तीफा का नाटक करने वाले लोग प्रेस क्लब के बाहर अभी भी अपने को पदाधिकारी बताते घूम रहे हैं।

रविवार, 2 जून 2013

मीडिया पर दबाव


छत्तीसगढ़ में इन दिनों मीडिया के लिए माहौल ठीक नहीं है। एक तरफ हैट्रिक में जुटी सरकार का दबाव है तो दूसरी तरफ दीगर राजनैतिक पार्टियों का दबाव भी कम नहीं है उपर से सोशल मीडिया की भ्रम फैलाने वाले तेवर भी कम हैरान करने वाले नहीं है।
्रहालांकि मीडिया के लिए या स्थिति कतई नई नहीं है। सरकारें कोई भी हो अपनी करतूत छुपाने वह मीडिया पर दबाव का सहारा लेती ही हे फिर छत्तीसगढ़ में बैठी भाजपा सरकार भी इससे अलग नहीं है। कोयले की कालिख पूते चेहरे से जब देख लुंगा जैसी आवाजे निकले तो मामला और भी मुश्किल हो जाता है।
रमन राज में वैसे भी माफिया गिरी बढ़ी है और अब तक करीब आधा दर्जन पत्रकार माफिया गिरी के शिकार हो चुके है। बिलासपुर के पाठक हत्याकांड हो या छूरा के राजपूत हत्याकांड हो सभी में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है।
इस सबके बीच सुखद स्थिति यह है कि सरकार विरोधी खबरों को पूरी तरह से रोकने में सरकारी तंत्र विफल रहा है। और वह खबर रोकने नये-नये हथकंडे अपना रही है।
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प्रतिष्ठा दांव पर
छत्तीसगढ़ में जब से पत्रिका का पदार्पण हुआ है पुराने प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबारों की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। पत्रिका के तेवर से सरकार में बेचैनी बढ़ी है तो पुराने लोगों को भी प्रतिस्पर्धा के चलते खबरें छापनी पड़ रही है।
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जनता से रिश्ता...
केन्द्रीय मंत्री नारायण सामी को कालिख पोतने के विवाद में आये पप्पू फरिश्ता ने अखबार खोल लिया है। इस अखबार में उन्होंने सनत चतुर्वेदी, अनिरूह दुबे जैसे पत्रकारों को रखा है। कहते है कभी इसी तरह का खेल कुख्यात बालकृष्ण अग्रवाल ने खेला था और तब भी राजनारायण मिश्र, एम.ए. जोसेफ, नारायण भोई अहफाज रशीद जैसे लोग झांसे में आ कर बाद में खूब पछताये थे।
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अमन का पथ
वैसे तो राजधानी में कई अखबार खुल और बंद हो रहे हैं जनदखल में अपना दखल दिखा चुके देवराज सिंह पवार इस बार अमन पथ लेकर आये हैं इस पथ की चर्चा अभी शुरू नहीं हो पाई है इसकी वजह यहां काम करने वाले पत्रकार दूसरी जगह ज्यादा समय दे रहे हैं।
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और अंत में...
कांग्रेसियों पर नक्सली हमला के बाद सरकार को सर्वदलीय बैठक बुलाने की सलाह जिस पत्रकार ने दी थी उसी पत्रकार ने कांग्रेस को बहिष्कार की भी सलाह दी।

बुधवार, 13 मार्च 2013

अपनी ढपली, अपना राग...


जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आने लगा है अखबार मालिकों ने अपना खेल शुरू कर दिया है। प्रसार बढ़ाने कुर्सी बांटने वाले भास्कर अब भी अपने को नंबर वन बता रहा है तो नवभारत, हरिभूमि और पत्रिका भी अपने को नम्बर वन बताते नहीं थकते ऐसे में पाठक किसे नम्बर वन माने? अब तो प्रसार बढ़ाने की होड़ में हर अखबार इनामी योजना से लेकर कुर्मी टेबल, हाटपॉट टिफीन बांट रहे है। इस दौड़ में नई दुनिया भी शामिल है। हालांकि नई दुनिया का मालिक से लेकर संपादक तक बदल चुका है। दूसरी तरफ पत्रकारों की स्थिति भी यही है। अब उनकी पहचान कलम की बजाय बैनर से होती है। और अधिकारी से लेकर नेता भी बड़े बैनर माने जाने वाले अखबार के पत्रकारों को ही ज्यादा पूछ परख करते हैं।
ऐसे में जब चुनाव नजदीक हो तो विज्ञापन और पेड न्यूज की मारा भारी के चलते बड़े बैनरों के इन पत्रकारों पर दबाव भी बहुत है। और अब तो पत्रकारों की किमत भी बढऩे लगी है। बैनर बदलने के एवज में वेतन भी बढ़ रहा है।  मुसिबत छोटे बैनर की बढ़ गई है क्योंकि छोटे बैनर के अच्छे पत्रकारों को बड़े बैनर वाले ज्यादा तनख्वाह देकर अपने यहां ले जाने लगे हैं।
इन सबके बीच छोटे बैनरों खासकर साप्ताहिक और मासिक पत्रिका निकाल रहे पत्रकारों की दिक्कतें भी इस चुनावी साल में बढऩे लगी है। क्योंकि बड़े बैनरों की अपनी सीमा हे और उन पर सरकार व जनसंपर्क विभाग का दबाव भी है जबकि इसके उलट छोटे बैनर वालों की पूछ तभी बढ़ती है जब वे दमदार खबर परोसते हैं।
हालांकि पत्रिका के आने के बाद बड़े अखबारों का तेवर भी बदला है लेकिन चुनाव तक यह तेवर बरकरार रहेगा इसे लेकर संशय जरूर कायम है। नंबर वन की दौड़ में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है औरइसे सरकार के बदले की कार्रवाई का भौंडा प्रदर्शन माना जा रहा है।  अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन नंबर वन की दौड़ में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई माना जा रहा है।
अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन इस बार एक मासिक पत्रिका से जुड़े अनिल श्रीवास्तव नायक पत्रकार ने जनसंपर्क के अधिकारी के खिलाफ सिटी कोतवाली में शिकायत की है। शिकायत किये एक माह हो गये लेकिन अभी तक जुर्म दर्ज भी नहीं हुआ है। यानी सरकारी दबाव जारी है।
और अंत में ...
मंत्रालय दूर होने से अफसरों को राहत तो मिली है लेकिन पत्रकारों की दिक्कत बड़ गई है। मंत्रालय के नाम पर समय व रूतबा झाडऩे वालों को अब अन्य सीटों पर मेहनत करनी पड़ रही है।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

बढ़ते हमले, ट्रटता तिलस्म...


एक जमाना था जब पत्रकारों के जलवे हुआ करते थे । उनकी खबर पर ने केवल कार्रवाई होती थी बल्कि उन्हें खबर के कबरेज की आजादी भी थी । लेकिन अब वैसा नहीं रह गया है । भ्रष्ट तंत्र ने बेईमानों को गेडें का रूप दे दिया है। लोक लाज का भय तो समाप्त हुआ ही है। कार्रवाई नहीं होने से उनके हौसले भी बुलंद है।
यही वजह है कि पत्रकारों के साथ न केवल दुव्र्यवहार की घटना बढ़ी है बल्कि उनकी सुरक्षा को लेकर भीषण सवाल भी खड़े हुए है। पत्रकारों को आये दिन धमकी की घटनाएं ही नहीं बढ़ी है बल्कि लचर सरकार के चलते उनकी हत्या भी होने लगी है । हाल ही में बिलासपुर द्वारा और कांकेर में पत्रकारों की हत्या हुई है जबकि मारपीट भी घटनाएं भी बढ़ी है ।
ताजा मामला राजधानी रायपुर के काईम ब्रांच का है । क्राईम ब्रांच के छापे की खबर पर कव्हरेज करने पहुंचे फोटोग्राफर नरेन्द्र बंगाले से मारपीट की गई जबकि साथ में मौजूद वरिष्ठ छायाकार विजय शर्मा भी दुव्र्यवहार के शिकार हुए । सादे वर्दी में मौजूद  क्राईम ब्रांच के सिपाही अभिषेक ने जिस तरह से बंगाले के साथ करतूत की वह कहीं से भी क्षम्य नहीं माना जा सकता  । ये अलग बात है कि कप्तान साहब ओजीपाल ने घटना की गंभीरता को देखते हुए उस सिपाही को निलंबित कर दिया लेकिन  सवाल यह है कि क्या अब कोई पुलिसवाला ऐसी हरकत नहीं करेगा ।
इससे पहले भी कई पत्रकार पुलिसिया करतूत के शिकार बन चुके है। और हर बार निलंबन के बाद मामला शांत हो जाता हे और फिर यह घटना दुहराई जाती है । निलंबन के साथ सजा का कड़ा प्रावधान क्यों नहीं होना चाहिए । सिर्फ पत्रकार ही नहीं आम आदमी के साथ भी पुलिसिया करतूत को संज्ञान में लेकर जब जक ऐसे लोगो के खिलाफ जुर्म दर्ज नहलीं किया जायेगा ऐसी घटनाएं होती रहेगी ।
सरकार को चाहिए कि वह ऐसी घटनाटनों पर जुर्म दर्ज करने अधिकारियों पर दबाव बनाये ।
और अंत में ...
बजर में पत्रकारों के लिए समान निधि, व्यक्तिगत दुर्घटना के लिए मुख्यमंत्री को धन्यवाद देने पहुंचे पत्रकारों में चेहरा दिखाने की होड़ मची रही । इस पर प्रेस क्लब में टिप्पणी होते रही कि किसे सम्मान निधि की अब जरूरत नहीं है ।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

पत्रकारिता पर मंडराता खतरा...


वैसे तो पहले ही पत्रकारिता में खतरें कम नहीं थे लेकिन इन दिनों छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता करना आसान नहीं रह गया है । रमन सरकार के संरक्षण में जहां एक तरफ माफियाओं या अपराधियों के हौसले बुलंद है तो दूसरी तरफ नक्सली भी पत्रकारों पर दबाव बढ़ाने लगे हैं । बिलासपुर का पाठक हत्याकांड हो या छुरा का राजपूत हत्याकांड हो सरकार और पुलिस के कारनामों ने अपराधियों को खुला छोड़ दिया है । आये दिन सरकार के भ्रष्टाचार की खबरें छापने पर धमकियों की खबरें आने लगी है यहां तक की पुलिस के दुव्र्यवहार की खबरें भी बड़ी है । सरकार अपने खिलाफ छपने वाली अखबारों पर चौतरफा दबाव बजा रही है तो पत्रकारां पर हमले भी तेज हुए हैं ।
नेमीचंद की हत्या...
कांकेर के पत्रकार नेमीचंद जैन की हत्या क्या सरकारी संरक्षण प्राप्त टीन तस्करों ने की है या नक्सलियों ने उनकी हत्या की है यह जांच का विषय हो सकता है । लेकिन यह पत्रकारिता पर हमला है और इस हमले को बदश्ति नहीं किया जाना चाहिहए । नेमीचंद जैन की हत्या को लेकर भले ही नक्सली ख्ंाडन कर रहे है लेकिन क्या यह पूर सच है । उनका खंडन संदेह के परे है । हालांकि आमतौर पर नक्सली जो भी करते है हिम्मत से उसकी जवाबदारी लेते है लेकिन यदि यह उनका कृत्य सरकार को भी उस टीन तस्कर की गिरफ्तारी जल्द करना चाहिए जिनका नाम सामने आ रहा है ।
पत्रिका पर प्रहार...
सरकार के करतूतों पर लीखा प्रहार करने वाले पत्रिका के पत्रकारों का विधानसभा का पास इस बार भी नहीं बनाया गया । यह ठीक है कि विधानसभा का पास किसका बनना है किसका नहीं यह विधानसभा का विशेषाधिकार है लेकिन सरकार यह जान ले कि यह पत्रकारिता पर प्रहार से कम नहीं है और इसके परिणाम क्या हो सकते हैं रमन सरकार को सोचना है ।
जनदखल बंद ! ...
एक पुरानी कहावत है नियत में बरकत होती है । जनदखल अपने तेवर बदला तो सरकार से सेटिंग की खबरें चर्चा का विषय बन गई । और अब उसके बंद हो जाने की खबर से एक बात तो तय है कि पत्रकारिता में ढुकुर सुहाती ज्यादा दिन नहीं चलती । यहां काम कर रहे सनत चुतुर्वेदी, प्रदीप डडसेना नई नौकरी की तलाश में हैं । सनत चुतुर्वेदी जी सीनियर पत्रकार हैं और पत्रकारिता की गरिमा के लिलए उनकी पहचान है ।
और अंत में...
चुनाव आते ही रंगा-बिल्ला फिर सक्रिय हो गए है । नये भारत के इस चर्चित जोड़ी का कमाल था कि ये खबरें प्रकाशित हो गई कि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने विधानसभा में प्रदर्शन के लिलए भाजपा विधायकों की पीठ ठोकी जबकि कहा जा रहा है कि पूरी बैठक में कांग्रेस के तेवर को लेकर चिंता के बादल छाये रहे ।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

जमीन लेने मची होड़...


इन दिनों राजधानी से निकलने वाले कई अखबार मालिकों में जमीन लेने की होड़ मची है । नई राजधानी में जमीन के लिए आवेदन देने का सिल-सिला भी शुरू हो गया है इनमें वे अखबार भी शामिल हैं जो पहले ही जमीन ले चुके हैं । हालांकि अभी तक सरकार की तरफ से कोई निर्णय नहीं हुआ है लेकिन आवेदन पहले से ही लगाये जा रहे हैं । जमीन लेने में व लीज की शर्तो का उल्लंघन करने में माहिर अखबारों की यहां कमी नहीं है । ओर ऐसे अखबार मालिक इस चुनावी साल का भरपुर फायदा उठाने अधिकारियों पर दबाव भी बना रहे है ।
ज्ञात हो कि रजबंधा तालाब पाटकर अखबार वालों को जमीन दी गई है । कहने को तो जमीन अखबार चलाने दी गई है लेकिन काम्प्लेक्स बनाये गये और दूकाने तक बेची जा रही है लेकिन इनके दबाव के आगे कार्रवाई तो दूनर टैक्स तक ठीक से वसूले नहीं जा रहे हैं ।
सुप्रीम कोर्ट के तालाब को लेकर दिये गये निर्देशों के स्पष्ट उल्लंघन के बाद न तो जिला प्रशासन ही कार्रवाई को तैयार है और न ही निगम द्वारा ही कार्रवाई की जा रही है ऐसे में नई राजधानी में इन्हें जमीन दिया जाना कहां तक उचित है यह सरकार ही जाने ।
 चौबे अब साधना में...
छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोसियेशन के संस्थापक सदस्य नितिन चौबे अब साधना न्यूज़ (मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़) के वाइस प्रेसिडेंट हो गये हैं। आज रात दिल्ली से लौटने पर एसोसियेशन के कार्यालय में नितिन का आत्मीय अभिनन्दन किया गया। छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रोनिक मीडिया एसोसियेशन से जुड़े सभी चैनल के ब्यूरो चीफ़, संवाददाता, रिपोर्टर और कैमरा पर्सन ने नितिन को दिल से बधाइयां देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की है। इसके पहले नितिन नेशनल चैनल जी.एन.एन. न्यूज़ के ब्यूरो चीफ़ थे।